सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को यूनिवर्सिटी ग्रांट कमिशन (यूजीसी) के उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता बनाए रखने से जुड़े नए नियमों पर रोक लगा दी.
कोर्ट ने कहा कि नए नियम ऐसे महत्वपूर्ण सवाल खड़े करते हैं, जिन्हें अनदेखा किया गया तो इसके ‘बहुत दूरगामी परिणाम’ हो सकते हैं और ये ‘समाज को विभाजित’ कर सकते हैं.
सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाला बागची की बेंच ने यूजीसी के इन नियमों को अस्पष्ट बताया और कहा कि इनके दुरुपयोग की आशंका है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यूजीसी के नए नियमों से समाज में विभाजन हो सकता है और ये बहुत व्यापक प्रभाव डाल सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि 75 साल बाद भी क्या हम जातिविहीन समाज की ओर बढ़ रहे हैं या पीछे जा रहे हैं? इसके बाद यूजीसी के नियमों को फिलहाल रोक दिया गया.
दरअस, सुप्रीम कोर्ट में यूजीसी के खिलाफ कई याचिकाओं पर गुरुवार को सुनवाई हुई. याचिका में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियमों को चुनौती दी गई. सुप्रीम कोर्ट ने दलीलें सुनने के बाद यूजीसी के नए नियमों पर रोक लगा दी. कोर्ट ने साफ कर दिया कि अभी पुराने यानी 2012 के नियम लागू रहेंगे. अब मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी. इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और यूजीसी को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. इस बीच सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के मन में कई सवाल उठे. यूजीसी के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट कोर्ट ने प्रथम दृष्टया कई गंभीर सवाल उठाए. कोर्ट ने कहा कि हमारी पहली नज़र में यह राय है कि विचार के लिए कानून के निम्नलिखित महत्वपूर्ण सवाल उठते हैं और इनके लिए विस्तृत जांच की आवश्यकता होगी-
भारत में कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में भेदभाव रोकने के लिए यूजीसी ने 13 जनवरी 2026 को नए रेग्युलेशन जारी किए थे.गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि पहली नज़र में ऐसा लगता है कि विवादित रेग्युलेशन के कुछ प्रावधान अस्पष्ट हैं और उनके दुरुपयोग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता.अदालत ने निर्देश दिया कि इस मामले को 19 मार्च को तीन जजों की बेंच के सामने सूचीबद्ध किया जाए. मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने सरकार से मौखिक रूप से यह भी कहा कि उसे इस मुद्दे के समाधान के लिए क़ानून के प्रतिष्ठित जानकारों की एक समिति गठित करनी चाहिए.
साल 2026 के नियम सुप्रीम कोर्ट में 2019 और 2016 में कथित जाति आधारित भेदभाव को लेकर पायल तडवी और रोहित वेमुला की माताओं की तरफ़ से दायर 20 याचिकाओं से आए हैं.उन्होंने उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव विरोधी व्यवस्था बनाने की मांग की थी.
याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व करने वाली इंदिरा जयसिंह ने नियमों पर रोक लगाने के अनुरोध का विरोध किया था. वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने इस मुद्दे पर एक एक्स पोस्ट में लिखा, ”अगर भारत सरकार ख़ुद अपने नियमों का बचाव नहीं कर सकती और बचने के लिए सुप्रीम कोर्ट की तरफ़ देखती है तो क्या कहा जा सकता है. यह संवैधानिक ड्यूटी की नाकामी है.”
सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के भेदभाव संबंधी नए नियम पर रोक लगा दी है. इसके बाद डॉक्टर पायल तडवी की मां आबेदा तडवी ने इस फ़ैसले निराशा जताई है.
उन्होंने कहा, “पिछले सात साल से हम अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और दूसरे हाशिये पर रह रहे समुदायों के छात्रों के लिए लड़ रहे हैं. हमारा मक़सद हमेशा यही रहा है कि पायल के साथ जो हुआ, वह किसी और के साथ न हो.”उन्होंने कहा, “इसी वजह से हम अदालत गए थे, इस उम्मीद में कि यूजीसी के नियम मज़बूत होंगे और ऐसी घटनाओं को रोका जा सकेगा. लेकिन इसके विपरीत बीते कुछ सालों में ऐसे मामलों की संख्या बढ़ती गई है.”
प्रकाश आंबेडकर ने क्या कहा
इस मुद्दे पर दलित नेता प्रकाश आंबेडकर ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में लिखा, “यह स्टे संवैधानिक विचारों और वास्तविक समानता, सामाजिक न्याय के साथ शिक्षा तक लोकतांत्रिक पहुंच के वादे के ख़िलाफ़ है.” उन्होंने आगे कहा कि, “सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नए रेग्युलेशन ‘समाज को बाँट देंगे’, लेकिन क्या यह पहले से ही जाति के आधार पर नहीं बँटा हुआ है? ये नियमन जातिगत भेदभाव के ख़िलाफ़ एक सुरक्षा कवच. थे”
प्रकाश आंबेडकर ने कहा, ””मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि कोई भी बुनियादी समानता के उपायों का विरोध कैसे कर सकता है? ये विरोध प्रदर्शन ख़ुद रोहित वेमुला, पायल तडवी और हज़ारों ऐसे लोगों की यादों पर एक हमला थे, जिन्होंने शैक्षणिक संस्थानों में जातिगत भेदभाव का सामना किया और अब भी कर रहे हैं.”
यूजीसी के पूर्व चेयरमैन सुखदेव थोराट ने कहा
इस मुद्दे पर यूजीसी के पूर्व चेयरमैन सुखदेव थोराट ने कहा, “जो नए नियमों के ख़िलाफ़ शिकायत कर रहे हैं, मेरा मानना है कि वो ग़लत है. मुझे लगता है कि वो आम तर्क ये दे रहे हैं कि उनके साथ भेदभाव होता है.” थोराट ने कहा, ”उच्च जाति के लोग चाहते हैं कि उनके लिए भी प्रावधान हो क्योंकि ग़लत शिकायतें आएंगी. मुझे लगता है कि ये सब ग़लत है. मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि उच्च जाति के कोई स्टूडेंट फ़िज़िकली डिसएबल हो और उसे प्रताड़ित किया जाता है तो ऐसा नहीं है कि नए नियमों में वो कवर नहीं होगा. वो भी कवर होगा.”
समाजशास्त्री प्रोफ़ेसर सतीश देशपांडे ने कहा
जाति और शिक्षा के मुद्दे पर व्यापक रूप से काम कर चुके समाजशास्त्री प्रोफ़ेसर सतीश देशपांडे ने ‘द वायर’ से कहा कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से लगाई गई रोक “निराशाजनक” है और यह “ग़लत संदेश” देती है. प्रोफ़ेसर देशपांडे ने कहा, ”2026 के नियमों को लागू करने में समस्याएं तो आतीं. समाज की शक्ति संरचना के ख़िलाफ़ जाने वाले किसी भी क़दम के साथ ऐसा ही होता है. लेकिन उनके दुरुपयोग की संभावना, जो किसी भी क़ानून के साथ होती है, इसका मतलब यह नहीं हो सकता कि कोई क़ानून ही न हो.”
उन्होंने कहा, “उच्च जातियों की यह चिंता थी कि उनके साथ भेदभाव हो सकता है. हां, यह हो सकता है और कभी-कभार होता भी है. लेकिन हमें देखना चाहिए कि समाज में ऐसी घटनाओं का पलड़ा किस ओर झुका है. समाज में शक्ति समीकरण क्या हैं, यही हमें देखना होगा.”
यूजीसी पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को समझे
(i) क्या विवादित रेगुलेशन में क्लॉज 3(c) को शामिल करना, जो ‘जाति-आधारित भेदभाव’ को परिभाषित करता है, 2026 के UGC रेगुलेशन के उद्देश्य और लक्ष्य को पूरा करने के लिए एक उचित और तर्कसंगत संबंध रखता है? खासकर इस तथ्य को देखते हुए कि जाति-आधारित भेदभाव से निपटने के लिए कोई अलग या विशेष प्रक्रियात्मक तंत्र निर्धारित नहीं किया गया है, जैसा कि विवादित रेगुलेशन के क्लॉज़ 3(e) के तहत प्रदान की गई ‘भेदभाव’ की विस्तृत और समावेशी परिभाषा के विपरीत है.
(ii) क्या विवादित रेगुलेशन के तहत ‘जाति-आधारित भेदभाव’ की शुरुआत और संचालन का अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के भीतर सबसे पिछड़े वर्गों के मौजूदा संवैधानिक और वैधानिक उप-वर्गीकरण पर कोई असर पड़ेगा, और क्या विवादित रेगुलेशन ऐसे अत्यंत पिछड़े वर्गों को भेदभाव और संरचनात्मक नुकसान के खिलाफ पर्याप्त और प्रभावी सुरक्षा और सुरक्षा उपाय-बचाव प्रदान करते हैं?
(iii) क्या विवादित रेगुलेशन के क्लॉज 7(d) में ‘अलगाव’ शब्द को शामिल करना, हॉस्टल, क्लासरूम, मेंटरशिप ग्रुप, या इसी तरह की शैक्षणिक या आवासीय व्यवस्थाओं के आवंटन के संदर्भ में, भले ही पारदर्शी और गैर-भेदभावपूर्ण मानदंडों पर हो, एक अलग लेकिन समान’ वर्गीकरण के बराबर होगा, जिससे अनुच्छेद 14, 15 के तहत समानता और भाईचारे की संवैधानिक गारंटी के साथ-साथ भारत के संविधान की प्रस्तावना का उल्लंघन होगा?
(iv) क्या विवादित रेगुलेशन के ढांचे में भेदभाव के एक विशिष्ट रूप के रूप में ‘रैगिंग’ शब्द को छोड़ देना, यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा) रेगुलेशन 2012 में इसके अस्तित्व के बावजूद, एक प्रतिगामी और बहिष्करणकारी विधायी चूक है? अगर ऐसा है, तो क्या ऐसी
चूक भेदभाव के पीड़ितों के साथ असमान व्यवहार करने वाली है, जिससे न्याय तक पहुंच में असंतुलन पैदा होता है और इस तरह यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करती है?
(v) कोई भी अन्य सहायक प्रश्न जो इन कार्यवाही के दौरान पक्षों द्वारा उठाया जा सकता है या प्रस्तावित किया जा सकता है और जिसमें इस न्यायालय के हस्तक्षेप की आवश्यकता हो.
सुनवाई के दौरान ये ही वो पांच सवाल थे जो सुप्रीम कोर्ट के मन में उठे थे, जिसके आधार पर अदालत ने नियमों पर रोक लगाई. सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि बिना इनकी गहराई से जांच के नियम लागू होने से समाज में गहरा विभाजन हो सकता है और शिक्षा संस्थानों में एकता खतरे में पड़ सकती है. अब केंद्र सरकार और UGC को नोटिस जारी किया गया है कि वे जवाब दें.
प्रोफ़ेसर देशपांडे ने कहा, ”उच्च जाति समूहों की ओर से किए गए व्यापक विरोध-प्रदर्शनों ने बीजेपी की उस हिंदुत्व की राजनीति की मज़बूती पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं, जो मूल रूप से ब्राह्मणवादी है. मैं इस बात से बेहद निराश हूं कि इस पर रोक लगा दी गई है. मुझे लगता है कि यह रोक ग़लत संदेश देती है. लेकिन मुझे इस बात पर भी आश्चर्य हुआ कि इस नियमन की घोषणा कैसे हुई? मैं केवल यही उम्मीद कर सकता हूं कि भविष्य में भी ऐसे सकारात्मक आश्चर्य मिलेंगे.”
प्रोफ़ेसर देशपांडे ने कहा, ”2026 के नियमों ने सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार किया कि भेदभाव अब एक सार्वजनिक मुद्दे के रूप में यहां रहने वाला है. पहले ऐसा नहीं था – 2010 के दशक तक उच्च शिक्षा में भेदभाव को वास्तव में कभी आधिकारिक तौर पर स्वीकार नहीं किया गया था. 2012 के नियमों ने इसे सामने लाया था लेकिन उन नियमों को उच्च शिक्षा संस्थानों द्वारा बड़े पैमाने पर नज़रअंदाज कर दिया गया. इस तरह उपेक्षा के ज़रिए नियमों को ख़त्म करने की एक प्रक्रिया चलती रही. जनता के दबाव, जनहित याचिकाओं और अदालतों के चलते, वर्तमान शासन ने भेदभाव को स्वीकार करने के लिए नियम जारी करना उचित समझा है.”
प्रोफ़ेसर देशपांडे ने कहा, ”किसी भी क़ानून के साथ दुरुपयोग की आशंका मौजूद रहती है. जब डकैती के ख़िलाफ़ क़ानून होता है, तो हम तुरंत लुटेरों के हितों की रक्षा की चिंता शुरू नहीं कर देते, हालांकि क़ानून के दुरुपयोग की संभावना हो सकती है. चोरी के झूठे मामले कभी-कभी लगाए जाते हैं, ख़ासकर घरेलू कामगारों के ख़िलाफ़. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कोई क़ानून ही न हो. अगर आप इस चिंता को अन्य संदर्भों में स्थानांतरित करें, तो यह साफ़ हो जाता है कि इसे पहली और प्राथमिक चिंता बनाना कितना बेतुका है.” प्रोफ़ेसर देशपांडे ने कहा, ”यह वास्तव में सामाजिक न्याय का नया चरण है, जिसमें हम अब प्रवेश कर रहे हैं, जहां हमें जटिल अंतःसंबंधों से निपटना पड़ेगा. पूरी तरह से पीड़ित या पूर्ण अपराधी के मामले बहुत कम होंगे, जो सब कुछ काले-सफेद, अच्छे-बुरे में सलीके से फिट हों. खासकर ओबीसी के प्रवेश के साथ, सामाजिक न्याय का संघर्ष एक बेहद चुनौतीपूर्ण चरण में पहुंच गया है, जहां इस बहुत बड़े और असुविधाजनक लेबल के तहत जोड़े गए समूह एक साथ उत्पीड़क भी हो सकते हैं और उत्पीड़ित भी.”


