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पीपीपी मॉडल के नाम पर सरकारी अस्पतालों का सौदा? केस स्टडीज ने खोली पोल, मुफ्त इलाज के दावों के बीच आम नागरिकों पर बढ़ा आर्थिक और मानसिक बोझ

by Admin
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देशभर में लोक स्वास्थ्य (Public Health) के बुनियादी ढांचे को सुधारने के नाम पर लागू किए जा रहे पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल का असली चेहरा अब जमीनी केस स्टडीज के जरिए सामने आने लगा है. हाल ही में पंजाब सरकार द्वारा अपने चार प्रमुख सिविल अस्पतालों को प्रबंधन के लिए निजी कंपनियों को सौंपने की योजना और उत्तर प्रदेश द्वारा 75 जिलों में पीपीपी आधारित मेडिकल कॉलेज खोलने की आक्रामक नीतियों के बीच, नागरिकों पर इसके विपरीत और दर्दनाक परिणाम दिखने शुरू हो गए हैं.

नई दिल्ली/चंडीगढ़:देशभर में लोक स्वास्थ्य (Public Health) के बुनियादी ढांचे को सुधारने के नाम पर लागू किए जा रहे पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल का असली चेहरा अब जमीनी केस स्टडीज के जरिए सामने आने लगा है. हाल ही में पंजाब सरकार द्वारा अपने चार प्रमुख सिविल अस्पतालों—राजपुरा, मोगा, मूनक और फिरोजपुर—को प्रबंधन के लिए निजी कंपनियों को सौंपने की योजना और उत्तर प्रदेश द्वारा 75 जिलों में पीपीपी आधारित मेडिकल कॉलेज खोलने की आक्रामक नीतियों के बीच, नागरिकों पर इसके विपरीत और दर्दनाक परिणाम दिखने शुरू हो गए हैं. जन स्वास्थ्य अभियानों और शोध संस्थानों द्वारा जारी ताजा विश्लेषण बताते हैं कि मुफ्त इलाज और विश्वस्तरीय सुविधाओं के सरकारी वादे केवल कागजों तक सीमित हैं, जबकि जमीन पर यह व्यवस्था गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों के लिए स्वास्थ्य की कंगाली का कारण बन रही है.

केस स्टडी 1: महाराष्ट्र का नगर निगम अस्पताल पीपीपी मॉडल – 3 से 15 गुना बढ़ी इलाज की दरें
‘जन स्वास्थ्य अभियान’ (JSA) द्वारा महाराष्ट्र के विभिन्न नगर निगमों के तहत संचालित 40 पीपीपी स्वास्थ्य परियोजनाओं पर की गई एक विस्तृत केस स्टडी ने इस मॉडल की विफलता को उजागर किया है. रिपोर्ट के मुताबिक, निजी कंपनियों को मुफ्त जमीन, बिजली, पानी और महंगे सरकारी उपकरण सौंपे जाने के बावजूद आम नागरिकों के लिए स्वास्थ्य सेवाएं अत्यधिक महंगी हो गईं. अध्ययन में पाया गया कि इन पीपीपी अस्पतालों में इलाज की दरें आम सरकारी अस्पतालों की तुलना में 3 से 15 गुना अधिक (कुछ मामलों में 25 गुना तक) पाई गईं. सबसे गंभीर बात यह रही कि आर्थिक रूप से कमजोर और समाज के हाशिए पर मौजूद वर्गों के लिए जो मुफ्त या रियायती इलाज का कोटा तय था, उसकी जानकारी को या तो पूरी तरह छुपाया गया या जरूरतमंद मरीजों को दाखिला देने से ही साफ इनकार कर दिया गया.

केस स्टडी 2: कर्नाटक में जिला अस्पतालों के निजीकरण का जमीनी विरोध और बदहाली
कर्नाटक के आठ जिला अस्पतालों को पीपीपी मॉडल के तहत निजी हाथों में सौंपे जाने के बाद वहां के ग्रामीण इलाकों में चिकित्सा पहुंच में भारी गिरावट दर्ज की गई. विजयपुरा और अन्य प्रभावित जिलों के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बताया कि निजी ऑपरेटरों ने कमान संभालते ही डायग्नोस्टिक टेस्ट, छोटी सर्जरी और दवाइयों के नाम पर छिपे हुए शुल्क (Hidden Charges) वसूलना शुरू कर दिया. इस नीति के विपरीत प्रभावों के चलते स्थानीय स्तर पर 106 दिनों तक लंबा जनांदोलन चला, जिसके बाद मुख्यमंत्री को हस्तक्षेप कर इस निजीकरण पर रोक लगानी पड़ी. नागरिक संगठनों का कहना है कि पीपीपी मॉडल के लागू होते ही अस्पताल की जवाबदेही राज्य के स्वास्थ्य विभाग के बजाय कंपनी के बोर्डरूम तक सीमित हो जाती है, जिससे गरीब मरीज पूरी तरह असहाय हो जाता है.

नागरिकों पर होने वाले विपरीत और घातक परिणाम
पीपीपी मॉडल के कारण आम जनता को केवल आर्थिक चपत ही नहीं लग रही, बल्कि उनके जीवन के साथ भी खिलवाड़ हो रहा है. महाराष्ट्र की ही एक अन्य केस स्टडी में यह दर्दनाक सच सामने आया कि मुनाफे को अधिकतम करने के लिए निजी कंपनियों ने आईसीयू (ICU) और आपातकालीन विभागों में योग्य एमडी (MD) डॉक्टरों के स्थान पर कम वेतन वाले, गैर-अनुभवी और अंडर-क्वालिफाइड स्टाफ (BAMS/BHMS) को तैनात कर दिया. इस लापरवाही की वजह से एक ही सेंटर में 140 से अधिक मरीजों की आईसीयू में मौत होने का मामला प्रकाश में आया, जो प्रशासनिक निगरानी की पूरी तरह से विफलता को दर्शाता है. जब सार्वजनिक अस्पतालों के परिसर कॉर्पोरेट कल्चर में ढल जाते हैं, तो मरीजों को मामूली परामर्श के लिए भी घंटों इंतजार करना पड़ता है और बिना अतिरिक्त भुगतान के एम्बुलेंस या स्ट्रेचर जैसी बुनियादी सुविधाएं भी नहीं मिलतीं.

सांस्कृतिक मुद्दों से ध्यान भटकाने की राजनीति और बजटीय हकीकत
आर्थिक और नीतिगत विश्लेषकों का स्पष्ट कहना है कि सोशल मीडिया या राजनीतिक मंचों पर सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के निजीकरण को ‘धार्मिक सुरक्षा’ या ‘अखंड भारत’ जैसे लोक-लुभावन सांस्कृतिक नारों से जोड़ना पूरी तरह निरर्थक है. स्वास्थ्य सेवा एक ऐसी सार्वभौमिक बुनियादी जरूरत है, जिसका आर्थिक दंश किसी धर्म या जाति को देखकर नहीं लगता. वर्तमान में भारत का सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च जीडीपी का मात्र 1.4% से 1.9% के बीच है, जो वैश्विक स्तर पर बेहद कम है. इस बजटीय कमी को छुपाने के लिए सरकारें पीपीपी मॉडल का सहारा लेकर अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी को कॉर्पोरेट घरानों के सुपुर्द कर रही हैं. परिणामस्वरूप, भारत में अपनी जेब से इलाज का खर्च (Out-of-Pocket Expenditure) बढ़कर लगभग 43.4% हो चुका है, जो हर साल लाखों मध्यमवर्गीय परिवारों को गरीबी रेखा के नीचे धकेलने के लिए जिम्मेदार है. यह स्थिति किसी काल्पनिक बाहरी खतरे की नहीं, बल्कि देश के अपने नागरिकों को उनके बुनियादी ‘स्वास्थ्य के अधिकार’ (अनुच्छेद 21) से वंचित करने का एक गंभीर नीतिगत संकट है.

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