Home » ‘School Theek Karo’ से काजीरंगा तक CJP का सवाल: आदिवासी बच्चों के स्कूल बदहाल, जमीन पर 5-स्टार होटल क्यों?

‘School Theek Karo’ से काजीरंगा तक CJP का सवाल: आदिवासी बच्चों के स्कूल बदहाल, जमीन पर 5-स्टार होटल क्यों?

by Admin
0 comments 46 views

गुवाहाटी/नागपुर। आदिवासी इलाकों में सरकारी स्कूलों की स्थिति को लेकर चलाए जा रहे Cockroach Janta Party (CJP) के ‘School Theek Karo’ अभियान के बीच अब असम के काजीरंगा का मुद्दा भी चर्चा में आ गया है। CJP नेता अशुतोष रांका ने अभियान के दौरान काजीरंगा में आदिवासी समुदाय की जमीन, प्रस्तावित लग्जरी होटल और इको-सेंसिटिव जोन (ESZ) को लेकर सवाल उठाए हैं।

काजीरंगा का यह विवाद केवल पर्यावरण का मामला नहीं रह गया है। इसके केंद्र में आदिवासी परिवारों की जमीन, पर्यटन परियोजना, वन्यजीव संरक्षण और स्थानीय समुदायों के विकास अधिकार—चारों सवाल एक साथ खड़े हैं।

‘स्कूल ठीक करो’ से जमीन और अधिकारों तक पहुंचा सवाल

CJP का ‘School Theek Karo’ अभियान सरकारी स्कूलों की जमीनी स्थिति की पड़ताल करने के उद्देश्य से शुरू किया गया है। CJP ने अलग-अलग राज्यों में स्कूलों का निरीक्षण कर बुनियादी सुविधाओं, शिक्षकों, शौचालय, पेयजल और भवनों की स्थिति को मुद्दा बनाया है।

16 सितंबर को CJP ने ‘Adivasi School Theek Karo’ अभियान शुरू किया और इसके बाद महाराष्ट्र के गढ़चिरौली समेत आदिवासी क्षेत्रों में स्कूलों की स्थिति को लेकर अभियान चलाया। India Today के अनुसार, CJP ने इस अभियान को महाराष्ट्र के बाद अन्य राज्यों तक ले जाने की योजना भी बताई है।

इसी अभियान के दौरान काजीरंगा का मुद्दा उठाते हुए अशुतोष रांका ने सवाल किया कि जिन आदिवासी इलाकों में बच्चों को बेहतर स्कूल, बुनियादी सुविधाएं और सुरक्षित भविष्य नहीं मिल रहा, वहां विकास की प्राथमिकताएं क्या होनी चाहिए?

उनके बयान का केंद्रीय सवाल यही बताया गया—आदिवासी बच्चों के स्कूलों की स्थिति सुधारने के बजाय उन्हीं क्षेत्रों में बड़े लग्जरी प्रोजेक्टों के लिए जमीन क्यों उपलब्ध कराई जा रही है?

काजीरंगा में 5-स्टार होटल परियोजना पर विवाद

काजीरंगा नेशनल पार्क के पास Inglay Pathar इलाके में करीब 20 आदिवासी परिवार जमीन को लेकर विवाद में हैं। इन परिवारों का कहना है कि वे जिस जमीन पर पीढ़ियों से खेती करते आए हैं, उसे लग्जरी होटल परियोजना के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।

जून 2026 में गौहाटी हाईकोर्ट ने इन परिवारों की याचिका पर Assam Tourism Development Corporation (ATDC) को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। प्रभावित परिवारों का दावा है कि उनके पास जमीन पर लंबे समय से खेती और कब्जे से जुड़े दस्तावेज हैं।

दूसरी तरफ सरकारी पक्ष का दावा है कि संबंधित करीब 30 एकड़ जमीन सरकारी भूमि है। ATDC ने 2025 के RTI जवाब में कहा था कि जमीन को 2022 में एक उप-विभागीय समिति ने सरकारी भूमि के रूप में चिन्हित किया था। यानी इस मामले में जमीन के मालिकाना हक को लेकर दोनों पक्षों के दावे अलग हैं और मामला अदालत में है।

Juniper Hotels से जुड़ा है प्रोजेक्ट

रिपोर्टों के मुताबिक इस जमीन को लेकर ATDC और लग्जरी होटल क्षेत्र से जुड़े पक्षों के बीच 2023 में समझौता हुआ था। परियोजना को Juniper Hotels से जोड़ा गया है, जो Hyatt से संबद्ध होटल परियोजनाओं का संचालन करती है।

यही वजह है कि स्थानीय आदिवासी परिवार और कार्यकर्ता इस परियोजना को केवल पर्यटन विकास का मामला नहीं मान रहे हैं। उनका सवाल है कि यदि जमीन पर समुदाय का लंबे समय से दावा है, तो किसी बड़े व्यावसायिक प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने से पहले उनके अधिकारों और दावों का समाधान क्यों नहीं किया गया?

हालांकि, जमीन का अंतिम कानूनी मालिकाना हक अदालत की प्रक्रिया में स्पष्ट होना बाकी है।

ESZ को 10 किलोमीटर से 1 किलोमीटर करने का मुद्दा

काजीरंगा विवाद का दूसरा बड़ा पहलू Eco-Sensitive Zone (ESZ) है।

अगस्त 2026 में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने काजीरंगा के आसपास मौजूदा 10 किलोमीटर की व्यवस्था को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार 1 किलोमीटर तक करने की योजना की बात कही थी।

इसके बाद इस पर राजनीतिक और पर्यावरणीय बहस तेज हो गई।

सरकार का कहना है कि 10 किलोमीटर की एक समान सीमा स्थानीय आबादी के रोजमर्रा के विकास और निर्माण गतिविधियों को प्रभावित करती है। सरकार का तर्क है कि ESZ को site-specific तरीके से तय किया जाना चाहिए। कुछ स्थानीय ग्रामीणों ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया है।

हालांकि, असम के मंत्री पीयूष हजारिका ने बाद में कहा कि यह कहना भ्रामक है कि सरकार काजीरंगा की पर्यावरणीय सुरक्षा को कमजोर करने के लिए ESZ को सीधे 10 से 1 किलोमीटर कर रही है। उनके अनुसार, सरकार सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुरूप ESZ को अधिसूचित करने की प्रक्रिया में है।

इसलिए ‘10 किमी से 1 किमी कटौती’ को अंतिम फैसला नहीं, बल्कि प्रस्तावित/प्रक्रियाधीन व्यवस्था के रूप में देखना अधिक सटीक है।

आदिवासी परिवारों की चिंता क्या है?

प्रभावित परिवारों का कहना है कि उनकी जमीन केवल संपत्ति नहीं, बल्कि पीढ़ियों से उनकी आजीविका का आधार है।

Down To Earth की रिपोर्ट के अनुसार, Inglay Pathar की जमीन पर खेती करने वाले परिवारों में से कुछ लोग आसपास के चाय बागानों में दिहाड़ी मजदूरी भी करते हैं। परिवारों ने जमीन पर अपने पुराने अधिकार और खेती का हवाला दिया है।

वहीं पर्यावरण विशेषज्ञों की चिंता यह है कि काजीरंगा के आसपास का पूरा भू-दृश्य वन्यजीवों के लिए महत्वपूर्ण है। मानसून के दौरान बाढ़ आने पर कई वन्यजीव पार्क के बाहर ऊंचे इलाकों की ओर जाते हैं। इसलिए पार्क की सीमा के बाहर के क्षेत्रों में होने वाला बड़ा निर्माण भी संरक्षण के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकता है।

CJP का सवाल: विकास किसके लिए?

यही वह बिंदु है जहां CJP के ‘School Theek Karo’ और ‘Adivasi School Theek Karo’ अभियान का काजीरंगा मुद्दे से संबंध बनता है।

CJP का कहना है कि आदिवासी इलाकों में बच्चों के स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी को दूर करना प्राथमिकता होनी चाहिए। दूसरी ओर, काजीरंगा में बड़े पर्यटन प्रोजेक्टों के लिए जमीन उपलब्ध कराने की कोशिशों पर स्थानीय समुदाय सवाल उठा रहा है।

अशुतोष रांका के बयान को इसी व्यापक सवाल के रूप में देखा जा रहा है—अगर किसी क्षेत्र के आदिवासी बच्चों को अच्छे स्कूल, शिक्षक, शौचालय, पेयजल और सुरक्षित भवन नहीं मिल रहे हैं, तो उसी क्षेत्र में बड़े पर्यटन प्रोजेक्टों के लिए सरकारी प्राथमिकताएं क्या हैं?

CJP के अभियान के संदर्भ में यह सवाल सिर्फ काजीरंगा तक सीमित नहीं है। संगठन ने स्कूलों की स्थिति की जांच को आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों तक ले जाने की बात कही है। India Today के मुताबिक, CJP ने महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, असम, झारखंड और बिहार समेत कई राज्यों में सरकारी स्कूलों के ऑडिट का दावा किया है।

मामला अब सिर्फ होटल बनाम पर्यावरण नहीं

काजीरंगा की कहानी को केवल ‘5-स्टार होटल बनाम पर्यावरण’ के रूप में देखना अधूरा होगा।

यहां कम से कम चार बड़े सवाल एक साथ जुड़े हैं—

पहला, जमीन पर आदिवासी परिवारों का वास्तविक कानूनी अधिकार क्या है?

दूसरा, प्रस्तावित होटल परियोजना के लिए पर्यावरणीय और अन्य जरूरी मंजूरियां किस स्तर पर हैं?

तीसरा, काजीरंगा के आसपास ESZ की अंतिम सीमा क्या होगी और उसे तय करते समय वन्यजीवों के आवागमन वाले क्षेत्रों को किस तरह शामिल किया जाएगा?

चौथा, क्षेत्र के आदिवासी और ग्रामीण बच्चों की शिक्षा तथा बुनियादी सुविधाओं को विकास की प्राथमिकताओं में कितना स्थान मिलेगा?

इनमें से पहले सवाल पर अदालत में सुनवाई चल रही है, जबकि ESZ को लेकर सरकार की प्रक्रिया भी जारी है।

‘School Theek Karo’ की अगली लड़ाई?

CJP के लिए काजीरंगा का मुद्दा उसके अभियान के मूल सवाल को और व्यापक बनाता है—सरकारी व्यवस्था का विकास आखिर किसके लिए और किसकी कीमत पर हो रहा है?

जहां एक ओर सरकार काजीरंगा में पर्यटन और स्थानीय विकास को बढ़ावा देने की बात कर रही है, वहीं प्रभावित आदिवासी परिवार अपनी जमीन और आजीविका की सुरक्षा की मांग कर रहे हैं। दूसरी ओर पर्यावरण समूह वन्यजीवों के आवास और कॉरिडोर को लेकर चिंता जता रहे हैं।

इस पूरे विवाद का समाधान अब अदालत के भूमि विवाद, ESZ की अंतिम अधिसूचना, होटल परियोजना की पर्यावरणीय प्रक्रिया और स्थानीय समुदाय के अधिकारों—इन सभी पहलुओं को साथ देखकर ही तय होगा।

काजीरंगा का सवाल इसलिए बड़ा है क्योंकि यह सिर्फ एक होटल या एक ESZ की सीमा का सवाल नहीं है। यह सवाल है कि आदिवासी इलाकों में विकास की दिशा कौन तय करेगा—सरकार और कॉरपोरेट परियोजनाएं, या स्थानीय समुदायों की भागीदारी के साथ तय होने वाली विकास नीति?

You may also like

Leave a Comment