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स्वतंत्र भारद्वाज को दोहरा झटका: हाईकोर्ट से राहत नहीं, पटियाला हाउस कोर्ट ने 21 सितंबर तक भेजा न्यायिक हिरासत में

by Admin
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नई दिल्ली: जंतर-मंतर पर जून में हुए प्रदर्शन के दौरान कथित मारपीट के मामले में सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर स्वतंत्र भारद्वाज को एक ही दिन में अदालतों से दो झटके लगे हैं। दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है, जबकि दिल्ली हाईकोर्ट ने उनकी गिरफ्तारी और हिरासत को चुनौती देने वाली हैबियस कॉर्पस याचिका खारिज कर दी। अब भारद्वाज को 21 सितंबर तक न्यायिक हिरासत में रहना होगा।

इस घटनाक्रम के बाद मामले को लेकर प्रदर्शन करने वाले कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने अदालत के फैसले पर खुशी जताई है। CJP प्रवक्ता सौरव दास ने सोशल मीडिया पर इसे संगठन और उसके समर्थकों के लिए बड़ी जीत बताया।

हाईकोर्ट में FIR को लेकर क्या हुआ?

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान स्वतंत्र भारद्वाज की ओर से पेश वकील ने उनकी गिरफ्तारी पर सवाल उठाते हुए दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही संबंधित मामलों में FIR रद्द कर चुका है। बचाव पक्ष का कहना था कि इसके बावजूद दिल्ली पुलिस उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर पहुंची और भारद्वाज को गिरफ्तार करके दिल्ली ले आई।

हालांकि, दिल्ली पुलिस ने इस दावे का विरोध किया। पुलिस की ओर से अदालत में कहा गया कि जिस FIR के आधार पर भारद्वाज को गिरफ्तार किया गया है, उसे सुप्रीम कोर्ट ने रद्द नहीं किया है।

इस पर हाईकोर्ट ने पुलिस से इस मुद्दे पर स्पष्ट स्थिति बताने को कहा कि संबंधित FIR अभी कानूनी रूप से अस्तित्व में है या नहीं। अदालत ने आवश्यकता पड़ने पर पुलिस को हलफनामा दाखिल करने अथवा तत्काल अपना बयान रिकॉर्ड पर रखने का विकल्प भी दिया। इसके बावजूद हाईकोर्ट ने भारद्वाज की हैबियस कॉर्पस याचिका खारिज कर दी।

बुलंदशहर से हुई थी गिरफ्तारी

स्वतंत्र भारद्वाज को 4 सितंबर को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर से दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया था। यह कार्रवाई उस समय हुई जब जंतर-मंतर की घटना से जुड़ा एक पॉडकास्ट क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। इस क्लिप में भारद्वाज पर संजय आजाद के साथ मारपीट करने का दावा करने की बात सामने आई थी।

मामला 23 जून 2026 का है। उस दिन जंतर-मंतर पर CJP का प्रदर्शन चल रहा था। शिकायत के मुताबिक, निशु आजाद के पिता संजय कुमार वहां मौजूद थे और प्रदर्शन का वीडियो बना रहे थे। इसी दौरान उनके साथ विवाद और कथित मारपीट हुई। पुलिस ने बाद में मामले में कार्रवाई आगे बढ़ाई।

भारद्वाज का क्या है पक्ष?

दूसरी ओर, स्वतंत्र भारद्वाज ने अपने ऊपर लगे आरोपों को अलग तरीके से पेश किया है। उनका दावा रहा है कि उन्होंने संजय आजाद पर आत्मरक्षा में कार्रवाई की थी। इस मामले को लेकर उनके पुराने बयानों और सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो ने विवाद को और बढ़ाया।

यानी मामले में फिलहाल दो अलग-अलग पक्ष सामने हैं—एक ओर शिकायतकर्ता पक्ष की ओर से मारपीट का आरोप है, जबकि भारद्वाज की ओर से इसे आत्मरक्षा बताया गया है। इन दावों की अंतिम कानूनी पुष्टि अभी अदालत में होने वाली सुनवाई और जांच के परिणाम पर निर्भर करेगी।

एक दिन की पुलिस हिरासत के बाद न्यायिक हिरासत

गिरफ्तारी के बाद 5 सितंबर को अदालत ने दिल्ली पुलिस को स्वतंत्र भारद्वाज की एक दिन की पुलिस हिरासत में पूछताछ की अनुमति दी थी। पुलिस हिरासत की अवधि पूरी होने के बाद उन्हें वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पटियाला हाउस कोर्ट में पेश किया गया।

इसके बाद अदालत ने उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया, जिसके तहत उनकी हिरासत 21 सितंबर तक रहेगी।

CJP ने फैसले को बताया बड़ी जीत

हाईकोर्ट से याचिका खारिज होने और ट्रायल कोर्ट से न्यायिक हिरासत मिलने के बाद CJP प्रवक्ता सौरव दास ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने अदालत के फैसले को संगठन के लिए बड़ी जीत बताते हुए कहा कि यह शांति और न्याय की मांग करने वालों के लिए महत्वपूर्ण घटनाक्रम है।

हालांकि, किसी आरोपी की गिरफ्तारी या न्यायिक हिरासत को दोष सिद्ध होना नहीं माना जा सकता। मामले में आरोपों की न्यायिक जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया अभी जारी है।

FIR में SC/ST एक्ट की धाराएं भी जोड़ी गईं

इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि पुलिस ने बाद में FIR में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम से संबंधित धाराएं जोड़ीं। इसके अलावा आपराधिक धमकी से संबंधित प्रावधान भी जोड़े जाने की जानकारी सामने आई थी।

मामले ने तब राजनीतिक और सामाजिक रूप से ज्यादा तूल पकड़ा, जब घटना से जुड़े वीडियो और सोशल मीडिया पोस्ट सामने आए। CJP की ओर से लगातार गिरफ्तारी की मांग की गई और दिल्ली पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए गए।

अब आगे क्या?

अब इस मामले में 21 सितंबर तक की न्यायिक हिरासत के साथ-साथ हाईकोर्ट में गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली याचिका खारिज होने के बाद अगली कानूनी प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी। खास तौर पर FIR की वैधानिक स्थिति, जांच में सामने आने वाले साक्ष्य और आरोपों की अदालत में होने वाली सुनवाई पर नजर रहेगी।

इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि राजनीतिक विचारधारा और सोशल मीडिया प्रभाव से अलग, कानून सभी पक्षों पर समान रूप से लागू होना चाहिए या नहीं। फिलहाल अदालत के सामने मामला है और अंतिम निष्कर्ष न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही निकलेगा।

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