मुंबई: महाराष्ट्र में भाषा को लेकर जारी राजनीतिक बहस के बीच राज्य की फडणवीस सरकार ने सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए हिंदी भाषा की अनिवार्य परीक्षा व्यवस्था खत्म करने का फैसला किया है। यह व्यवस्था करीब पांच दशक से लागू थी। सरकार के इस फैसले के बाद अब संबंधित कर्मचारियों को वेतन वृद्धि या पदोन्नति के लिए हिंदी भाषा की परीक्षा पास करने की बाध्यता नहीं रहेगी।
सरकार का यह निर्णय ऐसे समय में आया है, जब महाराष्ट्र में मराठी भाषा को लेकर भी राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बहस तेज है। हाल ही में ऑटो-रिक्शा और टैक्सी चालकों के लिए मराठी भाषा के ज्ञान से जुड़े नियम को लेकर विवाद हुआ था। सरकार ने इस मामले में संबंधित लोगों को मराठी सीखने के लिए एक साल का अतिरिक्त समय देने का फैसला किया था।
1976 से लागू थी हिंदी परीक्षा की व्यवस्था
महाराष्ट्र में सरकारी कर्मचारियों के लिए हिंदी भाषा की परीक्षा की व्यवस्था वर्ष 1976 से चली आ रही थी। इसके तहत कुछ श्रेणियों के अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए हिंदी परीक्षा पास करना आवश्यक था। परीक्षा पास करने का संबंध सेवा में वेतन वृद्धि और पदोन्नति जैसी सुविधाओं से भी था।
जून 2026 में भाषा संचालनालय की ओर से हिंदी भाषा परीक्षा आयोजित करने की घोषणा के बाद यह मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक विवाद में आ गया। परीक्षा के लिए 28 जून की तारीख निर्धारित की गई थी।
मनसे ने किया था विरोध
राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) ने हिंदी परीक्षा का सबसे मुखर विरोध किया था। मनसे नेता संदीप देशपांडे ने आरोप लगाया था कि महाराष्ट्र में कर्मचारियों पर हिंदी थोपने की कोशिश की जा रही है। पार्टी ने परीक्षा आयोजित किए जाने की स्थिति में परीक्षा केंद्रों पर विरोध प्रदर्शन की चेतावनी भी दी थी।
मनसे का कहना था कि महाराष्ट्र में सरकारी प्रशासन की प्रमुख भाषा मराठी है, ऐसे में सरकारी कर्मचारियों के लिए हिंदी परीक्षा को अनिवार्य बनाए रखने का औचित्य नहीं है।
शिवसेना यूबीटी ने भी उठाए सवाल
उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) ने भी सरकार के फैसले पर सवाल उठाए थे। पार्टी ने पूछा था कि जब महाराष्ट्र की प्रशासनिक व्यवस्था में मराठी का प्रमुख स्थान है और अंतरराज्यीय आधिकारिक संवाद में अंग्रेजी का इस्तेमाल होता है, तो सरकारी कर्मचारियों के लिए हिंदी परीक्षा क्यों जरूरी रखी गई है।
यूबीटी की ओर से यह सवाल भी उठाया गया था कि क्या दूसरे गैर-हिंदी भाषी राज्यों में भी सरकारी कर्मचारियों के लिए इसी तरह हिंदी परीक्षा अनिवार्य है।
सरकार का क्या है तर्क?
सरकार की ओर से दिए गए तर्क के मुताबिक महाराष्ट्र के भीतर प्रशासनिक कामकाज मुख्य रूप से मराठी में होता है, जबकि दूसरे राज्यों के साथ आधिकारिक पत्राचार के लिए अंग्रेजी का इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे में सरकारी कर्मचारियों की सेवा शर्तों में हिंदी परीक्षा को अनिवार्य बनाए रखने की आवश्यकता नहीं रह गई है।
सरकार ने इस व्यवस्था को समाप्त करने का फैसला 7 मई 2026 से प्रभावी माना है।
भाषा का मुद्दा फिर राजनीतिक केंद्र में
हिंदी परीक्षा समाप्त करने के फैसले ने महाराष्ट्र की राजनीति में भाषा के मुद्दे को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। एक तरफ मराठी भाषा के संरक्षण और उसके प्रशासनिक इस्तेमाल को लेकर क्षेत्रीय दल लगातार आवाज उठाते रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ हिंदी को लेकर केंद्र और राज्यों के बीच भाषा नीति पर बहस समय-समय पर सामने आती रही है।
फिलहाल फडणवीस सरकार के इस फैसले को महाराष्ट्र में मराठी बनाम हिंदी की बहस के संदर्भ में देखा जा रहा है। हालांकि, सरकार के फैसले का आधिकारिक आधार प्रशासनिक जरूरतों और सेवा नियमों में बदलाव बताया गया है।