Home » सत्य निकेतन हादसे पर किरण बेदी का बड़ा सवाल: ‘प्रशासन को मानव शरीर की तरह काम करना होगा, तभी रुकेंगे ऐसे हादसे’

सत्य निकेतन हादसे पर किरण बेदी का बड़ा सवाल: ‘प्रशासन को मानव शरीर की तरह काम करना होगा, तभी रुकेंगे ऐसे हादसे’

by Admin
0 comments 46 views

नई दिल्ली: दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में पांच मंजिला पीजी इमारत के ढहने से सात लोगों की मौत ने राजधानी में भवन सुरक्षा, प्रशासनिक निगरानी और सरकारी विभागों के बीच तालमेल पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हादसे के बाद जहां जांच और जिम्मेदारी तय करने की मांग तेज हुई है, वहीं पूर्व आईपीएस अधिकारी किरण बेदी ने प्रशासन की कार्यप्रणाली को लेकर एक व्यापक सवाल उठाया है।

किरण बेदी ने प्रशासन की तुलना मानव शरीर से करते हुए कहा कि जिस तरह मानव शरीर का हर अंग स्वस्थ और एक-दूसरे के साथ समन्वय में काम करता है, उसी तरह शासन-प्रशासन के हर विभाग को अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए एक-दूसरे के साथ तालमेल से काम करना चाहिए। उनके मुताबिक, यदि प्रशासन का कोई एक हिस्सा कमजोर या ‘बीमार’ हो जाए और बाकी व्यवस्था उस पर निगरानी न रखे तो उसका असर पूरी व्यवस्था पर पड़ता है।

‘बार-बार ऐसी घटनाएं क्यों हो रही हैं?’

सत्य निकेतन हादसे के संदर्भ में किरण बेदी ने सबसे अहम सवाल यही उठाया कि ऐसी घटनाएं बार-बार क्यों सामने आती हैं। उनका कहना है कि केवल हादसा होने के बाद राहत और बचाव कार्य करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि प्रशासन को पहले से ऐसे खतरों की पहचान करके कार्रवाई करनी चाहिए।

उन्होंने प्रशासन को मानव शरीर से जोड़ते हुए समझाया कि शरीर का हर अंग अलग-अलग काम करता है, लेकिन सभी अंग एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। इसी तरह सरकार और प्रशासन के अलग-अलग विभागों की अपनी जिम्मेदारियां हैं, लेकिन उनका अंतिम उद्देश्य जनता की सुरक्षा और बेहतर शासन होना चाहिए।

‘प्रशासन का हर अंग फिट होना जरूरी’

किरण बेदी के अनुसार प्रशासन में विभागों के सचिव, मंत्री, मुख्यमंत्री और उपराज्यपाल से लेकर स्थानीय निकायों के अधिकारी तक व्यवस्था के अलग-अलग अंग हैं। यदि इनमें से कोई भी अंग अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभाता तो पूरी व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।

उनका जोर इस बात पर है कि केवल नियम बना देना पर्याप्त नहीं है। नियमों का पालन हो रहा है या नहीं, इसकी नियमित निगरानी भी जरूरी है। खासकर भवन निर्माण, सुरक्षा मानकों, नगर नियोजन और नागरिक सुविधाओं से जुड़े विभागों में लापरवाही का सीधा असर आम लोगों की जान पर पड़ सकता है।

सत्य निकेतन हादसे ने इसी सवाल को और गंभीर बना दिया है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार हादसे के बाद इमारत के निर्माण और मंजूरियों को लेकर कई गंभीर सवाल सामने आए हैं। एक रिपोर्ट में MCD के आकलन के हवाले से बताया गया कि इमारत के पास स्वीकृत नक्शा नहीं था, बेसमेंट को लेकर भी अनियमितताएं थीं और फायर NOC का अभाव था।

‘लीडरशिप ऐसी हो जो पूरी व्यवस्था को जोड़े’

किरण बेदी ने प्रशासन में मजबूत नेतृत्व की जरूरत पर भी जोर दिया। उनका कहना है कि यदि व्यवस्था के अलग-अलग हिस्से अपनी-अपनी दिशा में काम करेंगे तो शासन प्रभावी नहीं हो सकता।

उन्होंने नेतृत्व की तुलना मानव शरीर के दिमाग से करते हुए कहा कि दिमाग दिशा देता है और शरीर के दूसरे अंग उसके साथ मिलकर काम करते हैं। इसी तरह प्रशासन में भी ऐसी नेतृत्व व्यवस्था जरूरी है जो अलग-अलग विभागों और अधिकारियों को एक साझा उद्देश्य से जोड़े।

उनके मुताबिक, चुने हुए जनप्रतिनिधियों और नियुक्त अधिकारियों के बीच भी समन्वय जरूरी है। विभागों के भीतर और विभागों के बीच एक जैसी सोच और जिम्मेदारी की भावना नहीं होगी तो प्रशासनिक व्यवस्था में कमजोरियां बनी रहेंगी।

‘अगर किसी अंग में बीमारी है तो सर्जरी जरूरी’

किरण बेदी ने प्रशासनिक भ्रष्टाचार और लापरवाही पर भी तीखी बात कही। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि किसी नगर निकाय का इंजीनियर नियमों को तोड़कर निजी लाभ लेने की कोशिश करता है तो इसका असर केवल उसके विभाग तक सीमित नहीं रहता। ऐसी व्यवस्था धीरे-धीरे पूरे प्रशासन को कमजोर कर सकती है।

उन्होंने कहा कि यदि प्रशासन के किसी एक हिस्से में ‘बीमारी’ है और वह दूसरे हिस्सों को भी प्रभावित कर रही है तो समय रहते उसकी ‘सर्जरी’ करनी होगी। यानी दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों पर समय रहते कार्रवाई, जवाबदेही और निगरानी की व्यवस्था मजबूत करनी होगी।

सत्य निकेतन हादसे के बाद बढ़े जवाबदेही के सवाल

सत्य निकेतन हादसे के बाद प्रशासनिक कार्रवाई भी शुरू हुई है। पुलिस ने इमारत के मालिक परिवार के सदस्यों को गिरफ्तार किया है, जबकि MCD ने पांच अधिकारियों को निलंबित किया है। हादसे के बाद पीजी इमारतों के स्ट्रक्चरल ऑडिट को लेकर भी चर्चा तेज हुई है।

दिल्ली हाईकोर्ट ने भी मामले में उच्चस्तरीय जांच की जरूरत पर जोर दिया है और राजधानी में छात्रों के लिए हॉस्टल सुविधाओं की स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। अदालत ने भवन नियमों के पालन और उनकी स्थिति की जांच को लेकर भी निर्देश दिए हैं।

सुप्रीम कोर्ट में भी दिल्ली के पीजी, निजी हॉस्टल और छात्र आवासों के सुरक्षा ऑडिट से जुड़ी याचिका पर विचार की खबर सामने आई है। इससे साफ है कि सत्य निकेतन की घटना अब केवल एक इमारत के गिरने का मामला नहीं रह गई है, बल्कि छात्र आवासों और शहरी भवन सुरक्षा की व्यापक व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रही है।

सवाल हादसे के बाद की कार्रवाई का नहीं, हादसे से पहले की निगरानी का है

किरण बेदी की बात का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि प्रशासन की सफलता का पैमाना केवल किसी दुर्घटना के बाद राहत एवं बचाव अभियान नहीं होना चाहिए। असली सवाल यह है कि जिस खतरे को पहले से पहचाना जा सकता था, उसे समय रहते रोका क्यों नहीं गया?

सत्य निकेतन जैसे इलाकों में बड़ी संख्या में छात्र पीजी और किराये के मकानों में रहते हैं। ऐसे में भवन की मजबूती, निर्माण की वैधता, अग्नि सुरक्षा और रहने योग्य परिस्थितियों की नियमित जांच बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

यदि किसी इमारत में गंभीर खामी है तो कार्रवाई हादसे के बाद नहीं, बल्कि हादसे से पहले होनी चाहिए।

‘हर विभाग अपनी जिम्मेदारी निभाए’

किरण बेदी का संदेश मूल रूप से प्रशासनिक जवाबदेही और समन्वय पर केंद्रित है। उनका कहना है कि शासन की व्यवस्था में हर व्यक्ति और हर विभाग की भूमिका महत्वपूर्ण है। अधिकारी अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से निभाएं, निगरानी तंत्र लगातार सक्रिय रहे और नेतृत्व सभी विभागों को एक दिशा में लेकर चले—तभी ऐसी घटनाओं को रोकने की संभावना बढ़ेगी।

सत्य निकेतन हादसे ने सात परिवारों को अपूरणीय क्षति दी है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस हादसे से प्रशासन क्या सीखता है। यदि जांच केवल दोष तय करने तक सीमित रह गई और व्यवस्था की उन कमियों को दूर नहीं किया गया जिनसे ऐसी दुर्घटनाओं की गुंजाइश बनती है, तो भविष्य में भी यही सवाल दोहराया जा सकता है।

किरण बेदी के ‘मानव शरीर’ वाले उदाहरण का सार यही है—प्रशासन का कोई भी अंग अलग-थलग होकर काम नहीं कर सकता। हर अंग को स्वस्थ रखना, लगातार निगरानी करना और जहां बीमारी दिखे वहां समय रहते ‘सर्जरी’ करना ही प्रभावी शासन की पहचान होनी चाहिए।

You may also like

Leave a Comment