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₹11.05 का IV सेट, MRP ₹325; ₹6.75 की सिरिंज ₹57.20 में—अस्पतालों में मेडिकल सामान की कीमतों पर तुकाराम मुंढे के सवाल

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महाराष्ट्र के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) कमिश्नर तुकाराम मुंढे ने इसी मुद्दे को उठाते हुए महाराष्ट्र में किए गए एक सर्वे के आंकड़े साझा किए हैं। उनके मुताबिक कुछ मेडिकल कंज्यूमेबल्स की ट्रेड/खरीद कीमत और उनकी छपी MRP के बीच कई गुना अंतर पाया गया। सबसे ज्यादा चर्चा उस उदाहरण की है, जिसमें ₹11.05 में खरीदे गए IV इन्फ्यूजन सेट पर ₹325 की MRP छपी मिली। मुंढे के अनुसार यह अंतर 2,841 प्रतिशत का है।

मुंबई: अस्पताल में इलाज कराने वाले मरीज के लिए दवाइयों के साथ-साथ सिरिंज, IV सेट, कैथेटर और दूसरे मेडिकल कंज्यूमेबल्स का खर्च भी बिल का हिस्सा बनता है। लेकिन इन उत्पादों की खरीद कीमत और उन पर छपी अधिकतम खुदरा कीमत यानी MRP के बीच बड़ा अंतर हो तो मरीज के सामने कीमत की पारदर्शिता का सवाल खड़ा होता है।

महाराष्ट्र के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) कमिश्नर तुकाराम मुंढे ने इसी मुद्दे को उठाते हुए महाराष्ट्र में किए गए एक सर्वे के आंकड़े साझा किए हैं। उनके मुताबिक कुछ मेडिकल कंज्यूमेबल्स की ट्रेड/खरीद कीमत और उनकी छपी MRP के बीच कई गुना अंतर पाया गया। सबसे ज्यादा चर्चा उस उदाहरण की है, जिसमें ₹11.05 में खरीदे गए IV इन्फ्यूजन सेट पर ₹325 की MRP छपी मिली। मुंढे के अनुसार यह अंतर 2,841 प्रतिशत का है।

मुंढे ने कहा कि अस्पताल में भर्ती मरीज के पास उपचार के दौरान इस्तेमाल होने वाले ऐसे कंज्यूमेबल्स की वास्तविक लागत की तुलना करने या कीमत पर सवाल उठाने की सीमित क्षमता होती है। उन्होंने इस अंतर को केवल कीमत का मामला नहीं, बल्कि मरीजों के लिए पारदर्शिता और सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा बताया है।

₹11.05 के IV सेट पर ₹325 की MRP

महाराष्ट्र FDA के सर्वे के जिन आंकड़ों को मुंढे ने सार्वजनिक किया, उनमें IV इन्फ्यूजन सेट का उदाहरण सबसे ज्यादा चौंकाने वाला है।

सर्वे के अनुसार:

  • IV इन्फ्यूजन सेट: ट्रेड कीमत ₹11.05, MRP ₹325
  • सिरिंज: खरीद कीमत ₹6.75, MRP ₹57.20
  • कैथेटर: खरीद कीमत ₹29.41, MRP ₹310

इन आंकड़ों के आधार पर IV सेट की MRP उसकी बताई गई ट्रेड कीमत से करीब 29 गुना है।

यहां यह समझना जरूरी है कि ट्रेड/प्रोक्योरमेंट कीमत और मरीज से अस्पताल द्वारा वसूली जाने वाली कीमत हमेशा एक ही चीज नहीं होती। MRP किसी उत्पाद पर निर्माता द्वारा घोषित अधिकतम खुदरा कीमत होती है। इसलिए केवल खरीद कीमत और MRP की तुलना से यह स्वतः साबित नहीं होता कि अस्पताल ने उतना ही अंतर मरीज से वसूला। यही कारण है कि इस मामले में मुद्दा पूरी मूल्य-श्रृंखला और पारदर्शिता का है।

सिरिंज और कैथेटर में भी बड़ा अंतर

FDA के सर्वे में केवल IV सेट ही नहीं, दूसरे सामान्य मेडिकल कंज्यूमेबल्स में भी बड़ा अंतर सामने आया।

₹6.75 की खरीद कीमत वाली 10 ml सिरिंज की MRP ₹57.20 बताई गई है। वहीं ₹29.41 में खरीदे गए कैथेटर की MRP ₹310 बताई गई।

इससे सवाल उठता है कि किसी मेडिकल उत्पाद की अंतिम कीमत तय होने तक निर्माता, वितरक, डीलर और अन्य स्तरों पर कितना मार्जिन जुड़ता है और उस पूरी प्रक्रिया की निगरानी किस तरह की जाती है।

मुंढे के मुताबिक समस्या यह भी है कि मरीज अक्सर अस्पताल में इलाज के दौरान बाजार में उपलब्ध कीमतों की तुलना नहीं कर सकता। ऐसे समय में उसे बिल में दर्ज कीमत स्वीकार करनी पड़ती है।

मुंढे ने केंद्र से समीक्षा की सिफारिश की

महाराष्ट्र FDA ने इन आंकड़ों के आधार पर केंद्र सरकार के संबंधित अधिकारियों के सामने मेडिकल कंज्यूमेबल्स और डिवाइस की कीमतों की समीक्षा की जरूरत रखी है।

रिपोर्टों के अनुसार FDA ने नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) से ऐसे उत्पादों की कीमतों और मार्जिन की समीक्षा करने का आग्रह किया है। प्रस्ताव में कीमतों की निगरानी बढ़ाने और कुछ जरूरी मेडिकल डिवाइस पर ट्रेड मार्जिन को नियंत्रित करने जैसे विकल्पों पर विचार की बात सामने आई है।

NPPA भी कीमतों की जांच कर रहा है

रिपोर्टों के मुताबिक NPPA यह देखने की प्रक्रिया में है कि मेडिकल डिवाइस और कंज्यूमेबल्स की कीमत तय होने के दौरान निर्माता और सप्लाई चेन में शामिल दूसरे पक्ष कितना मार्जिन जोड़ रहे हैं।

इसके लिए कंपनियों के दस्तावेजों और प्राइस लिस्ट की तुलना महाराष्ट्र FDA के सर्वे से मिले आंकड़ों के साथ की जा रही है। पंजाब, राजस्थान और तमिलनाडु के ड्रग-कंट्रोल अधिकारियों की ओर से भी ऐसी चिंताएं सामने आने की बात रिपोर्टों में कही गई है।

इस जांच का उद्देश्य यह समझना है कि अलग-अलग स्तरों पर कीमतों में कितना अंतर पैदा हो रहा है और क्या कुछ मेडिकल कंज्यूमेबल्स के लिए अलग नियामकीय व्यवस्था की आवश्यकता है।

क्या हर मेडिकल डिवाइस की कीमत पर सरकार की सीमा है?

यहीं इस पूरे मामले का एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू सामने आता है।

Drugs (Prices Control) Order, 2013 के तहत सरकार कुछ अनुसूचित दवाओं की कीमतों के लिए सीलिंग प्राइस तय करती है। इसके अलावा कुछ निर्दिष्ट मेडिकल डिवाइस भी मूल्य नियंत्रण के दायरे में आ सकते हैं।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर मेडिकल डिवाइस या हर अस्पताल में इस्तेमाल होने वाले कंज्यूमेबल पर एक समान सरकारी कीमत सीमा लागू है।

गैर-अनुसूचित उत्पादों के मामले में MRP में 12 महीने के दौरान अधिकतम 10 प्रतिशत वृद्धि की निगरानी संबंधी व्यवस्था है। यह व्यवस्था हर मेडिकल डिवाइस के लिए एक समान अधिकतम कीमत तय करने के बराबर नहीं है।

यही नियामकीय अंतर अब चर्चा का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।

कुछ मेडिकल उत्पाद पहले से कीमत नियंत्रण में

भारत में कुछ विशेष मेडिकल उत्पादों पर सरकार पहले भी कीमत नियंत्रण या ट्रेड मार्जिन से जुड़े कदम उठा चुकी है।

कोरोनरी स्टेंट और घुटने के इम्प्लांट जैसी श्रेणियां पहले कीमत नियंत्रण के दायरे में लाई जा चुकी हैं। कोविड-19 महामारी के दौरान ऑक्सीजन कंसंट्रेटर समेत कुछ जरूरी मेडिकल डिवाइस पर ट्रेड मार्जिन को नियंत्रित करने की व्यवस्था भी लागू की गई थी।

महाराष्ट्र FDA की मौजूदा सिफारिशों ने इसी सवाल को फिर सामने ला दिया है कि क्या सामान्य अस्पताल कंज्यूमेबल्स की कुछ श्रेणियों के लिए भी इसी तरह की निगरानी या मार्जिन नियंत्रण की जरूरत है।

अस्पतालों का भी अलग पक्ष

इस मुद्दे पर अस्पतालों की लागत को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अस्पतालों का कहना है कि मरीज से ली जाने वाली कुल राशि केवल किसी एक मेडिकल उत्पाद की खरीद कीमत से तय नहीं होती।

अस्पतालों को डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ, 24 घंटे की सेवाओं, उपकरणों, संक्रमण नियंत्रण, बिजली, ऑक्सीजन, आपातकालीन सुविधाओं, रखरखाव और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च करना पड़ता है।

मेडिकल-डिवाइस उद्योग की ओर से भी यह तर्क सामने आया है कि केवल एक समान मार्जिन सीमा लगाने के बजाय उत्पाद की तकनीकी जटिलता और उसे मरीज तक उपलब्ध कराने की वास्तविक लागत को ध्यान में रखते हुए पारदर्शी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए।

मरीज के लिए सबसे बड़ा सवाल—बिल में पारदर्शिता

इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू मरीज और उसके परिवार की जानकारी से जुड़ा है।

अस्पताल में भर्ती व्यक्ति के पास आम तौर पर यह जानने का आसान तरीका नहीं होता कि इस्तेमाल की जा रही सिरिंज, IV सेट या कैथेटर अस्पताल ने किस कीमत पर खरीदा था। दूसरी तरफ इलाज के दौरान मरीज के लिए वैकल्पिक उत्पाद या दूसरे सप्लायर की कीमतों की तुलना करना भी व्यावहारिक रूप से मुश्किल हो सकता है।

इसी वजह से तुकाराम मुंढे ने कहा है कि मरीज को उस कीमत के बारे में पर्याप्त जानकारी मिलनी चाहिए जो उससे मेडिकल कंज्यूमेबल के लिए ली जा रही है।

क्या सरकार प्राइस कैप लगाएगी?

फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि इन सभी मेडिकल कंज्यूमेबल्स पर सरकार सीधे प्राइस कैप लागू करेगी। अभी मुख्य बात यह है कि महाराष्ट्र FDA ने कीमतों में अंतर का मुद्दा केंद्र के सामने रखा है और NPPA स्तर पर इसकी समीक्षा की जा रही है।

आगे सरकार के सामने कई विकल्प हो सकते हैं—जैसे कुछ जरूरी मेडिकल डिवाइस पर ट्रेड मार्जिन की सीमा, कीमतों की नियमित निगरानी, निर्माताओं से कीमत निर्धारण का अधिक स्पष्ट विवरण लेना या मरीज के बिल में मेडिकल कंज्यूमेबल्स की कीमत को अधिक पारदर्शी बनाना।

₹11 से ₹325 की कहानी ने क्यों बढ़ाई बहस?

तुकाराम मुंढे द्वारा साझा किए गए आंकड़ों ने अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाले मेडिकल कंज्यूमेबल्स की कीमत को लेकर एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा किया है—किसी उत्पाद की निर्माण या ट्रेड कीमत और मरीज तक पहुंचने वाली कीमत के बीच कितना अंतर उचित माना जाना चाहिए और इसे तय करने का आधार क्या हो?

महाराष्ट्र FDA के सर्वे में मिले उदाहरण इस अंतर की तस्वीर सामने रखते हैं। हालांकि, इन आंकड़ों को पूरे अस्पताल क्षेत्र या हर मेडिकल उत्पाद पर लागू करना उचित नहीं होगा। ये सर्वे में सामने आए विशिष्ट उदाहरण हैं।

अब निगाहें केंद्र और NPPA की समीक्षा पर हैं। यदि जांच में व्यापक और अनुचित मूल्य-अंतर की पुष्टि होती है, तो मेडिकल कंज्यूमेबल्स की कीमतों की निगरानी और मरीजों को बिलिंग में अधिक पारदर्शिता देने के लिए नए नियमों पर विचार हो सकता है।

यानी सवाल सिर्फ ₹11.05 के IV सेट का ₹325 MRP होना नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि इलाज के समय मरीज जिस कीमत का भुगतान करता है, उसे तय करने की पूरी प्रक्रिया कितनी पारदर्शी, तर्कसंगत और जवाबदेह है।

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