जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान राष्ट्रीय ध्वज फहराने के मामले में सौरव दास और आशुतोष रंका तिहाड़ जेल में; अरविंद केजरीवाल ने भी गिरफ्तारी को बताया बेतुका
नई दिल्ली। जंतर-मंतर पर तिरंगा फहराने के मामले में CJP नेताओं सौरव दास और आशुतोष रंका को न्यायिक हिरासत में भेजे जाने पर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने दोनों युवाओं की हिरासत की निंदा करते हुए इसे कायरतापूर्ण कदम बताया है। वहीं, आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी सवाल उठाया है कि क्या अपने ही देश में राष्ट्रीय ध्वज फहराना अपराध है?
इस मामले ने शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन के अधिकार, राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान और प्रशासनिक प्रतिबंधों के बीच संतुलन को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
राहुल गांधी बोले- शांतिपूर्ण प्रदर्शन में तिरंगा फहराना अपराध नहीं
राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए कहा कि जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन के दौरान तिरंगा फहराना कोई अपराध नहीं है। उन्होंने युवाओं को जेल भेजे जाने की आलोचना करते हुए इसे कायरतापूर्ण कार्रवाई बताया।
राहुल गांधी के मुताबिक, छात्र, युवा, पत्रकार और INDIA गठबंधन से जुड़े लोग भले ही अलग-अलग बैनरों के तहत अपनी आवाज उठा रहे हों, लेकिन उनके संघर्ष का मूल उद्देश्य नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की मांग करना है।
उन्होंने जंतर-मंतर को देश के लोगों का स्थल बताते हुए कहा कि इसे फिर से हासिल किया जाएगा।
राहुल गांधी का यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह CJP नेताओं की हिरासत को केवल दो कार्यकर्ताओं का मामला न मानकर व्यापक नागरिक अधिकारों और विरोध-प्रदर्शन की स्वतंत्रता से जोड़ता है।

केजरीवाल ने पूछा- क्या अपने देश में झंडा फहराना अपराध है?
अरविंद केजरीवाल ने भी दोनों नेताओं को हिरासत में लिए जाने की आलोचना की। उन्होंने X पर सवाल उठाया कि क्या अपने ही देश में अपना झंडा फहराना अपराध है? उन्होंने इस कार्रवाई को बेतुका बताया।
दो प्रमुख विपक्षी नेताओं के समर्थन में सामने आने से यह मामला राजनीतिक रूप से और महत्वपूर्ण हो गया है। अब बहस केवल गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी सवाल उठ रहा है कि लोकतंत्र में असहमति जताने वाले नागरिकों के साथ प्रशासन का व्यवहार कैसा होना चाहिए।
पुलिस का आरोप- बॉन्ड का उल्लंघन कर जंतर-मंतर में किया प्रवेश
पुलिस सूत्रों के अनुसार, सौरव दास और आशुतोष रंका को शांति बनाए रखने के लिए दिए गए बॉन्ड का उल्लंघन करने और जंतर-मंतर में कथित तौर पर जबरन प्रवेश करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। इसके बाद दोनों को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजे जाने और तिहाड़ जेल में रखे जाने की जानकारी सामने आई है।
पुलिस ने उनके खिलाफ अनधिकृत प्रवेश, निषेधाज्ञा के उल्लंघन, शांति बनाए रखने के बॉन्ड का उल्लंघन और सरकारी कर्मचारी को आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन से रोकने जैसे आरोपों में मामला दर्ज किया है।
गौरतलब है कि जंतर-मंतर को हाल ही में विरोध-प्रदर्शनों के लिए निर्धारित स्थल के रूप में डिनोटिफाई किया गया था। ऐसे में पुलिस की कार्रवाई का आधार स्थल से जुड़े प्रतिबंधों और कथित नियम उल्लंघन को बताया जा रहा है।
हालांकि, पुलिस के आरोप अपने आप में दोष सिद्ध होने का प्रमाण नहीं हैं। मामले में आरोपों की वैधता और संबंधित परिस्थितियों का अंतिम निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया के तहत होना है।

जंतर-मंतर से जुड़े प्रतिबंधों ने बढ़ाई बहस
जंतर-मंतर लंबे समय से राजनीतिक दलों, छात्र संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और नागरिक समूहों के विरोध-प्रदर्शनों का प्रमुख केंद्र रहा है। यहां प्रदर्शन के लिए निर्धारित नियमों और अनुमति की व्यवस्था का उद्देश्य सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना है। लेकिन जब किसी प्रमुख प्रदर्शन स्थल पर प्रतिबंध लगाए जाते हैं, तो यह सवाल भी उठता है कि नागरिकों को अपनी मांगें रखने के लिए पर्याप्त और सुलभ विकल्प मिल रहे हैं या नहीं।
CJP नेताओं की हिरासत ने इसी बहस को फिर सामने ला दिया है। एक ओर प्रशासन सार्वजनिक व्यवस्था और लागू प्रतिबंधों के पालन की दलील दे सकता है, तो दूसरी ओर प्रदर्शनकारियों के समर्थक शांतिपूर्ण विरोध और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लोकतंत्र का आवश्यक हिस्सा मानते हैं।
असली सवाल: नियमों का पालन या विरोध की आवाज पर रोक?
इस पूरे घटनाक्रम में दो पहलुओं को अलग-अलग समझना जरूरी है। पहला, क्या प्रदर्शनकारियों ने लागू प्रतिबंधों, अनुमति संबंधी शर्तों या शांति बनाए रखने के बॉन्ड का उल्लंघन किया? दूसरा, क्या प्रशासनिक नियमों को लागू करते समय शांतिपूर्ण असहमति और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की पर्याप्त सुरक्षा की गई?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्वक, बिना हथियार एकत्र होने का अधिकार देता है। हालांकि, ये अधिकार कानून के तहत उचित प्रतिबंधों के अधीन हैं। इसलिए किसी कार्रवाई का मूल्यांकन केवल तिरंगा फहराने के आधार पर या केवल पुलिस के आरोपों के आधार पर नहीं, बल्कि पूरे घटनाक्रम, लागू आदेशों और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर किया जाना चाहिए।
फिलहाल, सौरव दास और आशुतोष रंका की हिरासत ने जंतर-मंतर पर विरोध-प्रदर्शन की जगह और नागरिक अधिकारों को लेकर बहस को फिर तेज कर दिया है। अब महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या प्रदर्शनकारियों को अपनी मांगें शांतिपूर्ण ढंग से रखने के लिए पर्याप्त अवसर मिलेंगे और क्या प्रशासनिक प्रतिबंधों तथा संवैधानिक स्वतंत्रताओं के बीच संतुलन कायम किया जा सकेगा।