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जब भारत का रुपया गिर रहा तो दूसरे एशियाई देशों की मुद्रा कैसे हो रही मज़बूत ?

by Admin
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रुपए में गिरावट का असर क्या होता है?
कमज़ोर होती मुद्रा का सबसे सीधा असर आयात पर पड़ता है. जब रुपया गिरता है, तो तेल, रसोई गैस, उर्वरक और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी ज़रूरी वस्तुओं का आयात महंगा हो जाता है. भारत इनमें से ज़्यादातर चीज़ें विदेशों से ख़रीदता है.

नरेंद्र मोदी जब 26 मई, 2014 को पहली बार भारत के प्रधानमंत्री बने तो अमेरिका का एक डॉलर भारत के 58.94 रुपए के बराबर था. मोदी जब दूसरी बार चुनाव जीतकर आए तो रुपए में 17 प्रतिशत से ज़्यादा की गिरावट हो चुकी थी और 30 मई, 2019 को रुपया एक डॉलर की तुलना में 69.37 पर पहुँच गया था.
नरेंद्र मोदी ने जून 2024 में तीसरा कार्यकाल संभाला और रुपया 83.38 के स्तर पर पहुँच गया था. यानी 2019 से 2024 के बीच रुपए में 20 फ़ीसदी से ज़्यादा की गिरावट आई.

अब जब तीसरे कार्यकाल के दो साल पूरे हो गए हैं तो रुपया एक डॉलर की तुलना में क़रीब 96 पर है और इन दो वर्षों में 14.75 प्रतिशत की गिरावट आई है. कुल मिलाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 12 वर्षों के कार्यकाल में रुपए में 62.33 प्रतिशत की गिरावट आई है.

अभी भारतीय मुद्रा रुपए में आई कमज़ोरी को लेकर कई तरह के गंभीर सवाल उठ रहे हैं. आमतौर पर किसी देश की अर्थव्यवस्था अगर अपने प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में तेज़ी से बढ़ रही हो तो उसकी मुद्रा मजबूत होती है. लेकिन भारत के साथ ऐसा नहीं है. एक समय में मोदी की आर्थिक नीतियों के प्रशंसक रहे सुरजीत भल्ला भी यही सवाल पूछ रहे हैं कि अगर अर्थव्यवस्था में तेज़ी है तो रुपया क्यों गिर रहा है?

आंकड़े बताते हैं कि पिछले कुछ सालों में भारत की आर्थिक वृद्धि दर चीन से भी ज़्यादा रही है, लेकिन इसके बावजूद हाल के वर्षों में रुपया साल दर साल कमज़ोर होता गया है. मोदी सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम भी मानते हैं कि रुपए में कमज़ोरी केवल ईरान युद्ध के कारण नहीं है.

अरविंद सुब्रमण्यम ने 26 मई इंडियन एक्सप्रेस में एक आर्टिकल में लिखा था, ”युद्ध से पहले के दो-तीन वर्षों में तुर्की को छोड़कर शायद ही किसी देश की मुद्रा में इतनी बड़ी गिरावट आई जितनी भारतीय रुपये में. भारतीय रिज़र्व बैंक ने उसे बचाने के लिए असाधारण स्तर पर हस्तक्षेप किया तब भी इसका कोई असर नहीं हुआ. 2022 से फ़रवरी 2026 के बीच रुपया 20 प्रतिशत से ज़्यादा गिर गया जबकि आरबीआई की हर कोशिश नाकाम रही.”

भारत का रुपया कमज़ोर हुआ है तो एशिया के ही कई देशों की मुद्राओं में मज़बूती आई है.


मलेशिया की मुद्रा रिंगिट पिछले साल 9.25% मज़बूत हुई जबकि इसी साल भारत का रुपया 4.40 प्रतिशत कमज़ोर हुआ. मलेशिया की मुद्रा रिंगिट पिछले सात वर्षों के सबसे मज़बूत स्तर पर पहुंच चुकी है. जनवरी 2025 में यह लगभग 4.50 तक टूटी थी, लेकिन उसके बाद इसमें तेज़ वापसी देखने को मिली. इस उछाल ने रिंगिट को दक्षिण-पूर्वी एशिया की सबसे तेज़ी से मज़बूत होने वाली मुद्रा बना दिया है.

इसके पीछे कई वैश्विक कारण बताए जा रहे हैं. जैसे मलेशिया को लेकर विदेशी निवेशकों का भरोसा बढ़ रहा है.मलेशिया की मुद्रा रिंगिट की मज़बूती का कारण बताते हुए निक्केई एशिया ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ”इसके पीछे देश का करंट अकाउंट सरप्लस, मज़बूत घरेलू अर्थव्यवस्था और 2025 में 4.9 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि दर जैसी बुनियादी आर्थिक वजहें भी हैं. एफ़डीआई में भी तेज़ बढ़ोतरी हुई है, जिससे स्थानीय मुद्रा की मांग मज़बूत हुई. जुलाई से अक्तूबर 2025 के दौरान तीसरी तिमाही में शुद्ध विदेशी निवेश प्रवाह बढ़कर 8.5 अरब रिंगिट पहुंच गया जबकि दूसरी तिमाही में यह सिर्फ़ 1.6 अरब रिंगिट था.”


थाईलैंड की मुद्रा बाट भी अमेरिकी डॉलर के मुक़ाबले मज़बूत प्रदर्शन करने वाली प्रमुख एशियाई मुद्राओं में शामिल रही. जनवरी में बाट मज़बूत होकर प्रति डॉलर 31 से नीचे पहुंच गया, जो जून 2021 के बाद उसका सबसे मज़बूत स्तर था. यह एक वर्ष पहले की तुलना में 10 प्रतिशत से अधिक की बढ़त थी.

11 मई को पीपल्स बैंक ऑफ़ चाइना ने डॉलर के मुक़ाबले रेनमिन्बी की डेली फिक्सिंग 6.8467 प्रति डॉलर तय की थी जो मार्च 2023 के बाद सबसे मज़बूत स्तर है. अमेरिका और यूरोप आरोप लगाते रहे हैं कि चीन का बढ़ता व्यापार सरप्लस इसलिए है क्योंकि वह अपनी मुद्रा को कृत्रिम रूप से कमज़ोर रखता है.
पिछले साल रेनमिन्बी यूरो के मुक़ाबले लगभग आठ प्रतिशत कमज़ोर हुआ था. इससे यूरोपीय यूनियन में चीन का निर्यात रिकॉर्ड स्तर तक पहुँच गया.

गोल्डमैन सैक्स का अनुमान है कि रेनमिन्बी अब भी लगभग 20 प्रतिशत अवमूल्यित है और आने वाले समय में डॉलर के मुक़ाबले और मज़बूत हो सकता है. चीन में वर्षों से जारी डिफ्लेशन ने भी इस चिंता को बढ़ाया है कि युआन वास्तविक मूल्य से कमज़ोर बना हुआ है.सिंगापुर
सिंगापुर की करेंसी को सिंगापुर डॉलर कहते हैं. अमेरिकी डॉलर की तुलना में सिंगापुर के डॉलर में भी मज़बूती आई है. पिछले पांच महीनों में क़रीब एक प्रतिशत की मज़बूती आई है. अभी एक अमेरिकी डॉलर की तुलना में 1.28 सिंगापुर डॉलर देने होते हैं.

पिछले वर्ष सिंगापुर की अर्थव्यवस्था पाँच प्रतिशत बढ़ी थी जो पहले के 4.8 प्रतिशत अनुमान से अधिक थी.सिंगापुर ने अप्रैल में बेहद मज़बूत व्यापार आंकड़े दर्ज किए.देश के प्रमुख ग़ैर-तेल घरेलू निर्यात अप्रैल में 24.5 प्रतिशत बढ़े जो फ़रवरी 2012 के बाद सबसे तेज़ वृद्धि दर है.इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात में तो 66.7 प्रतिशत की तेज़ छलांग दर्ज की गई, जो पूरे एशिया में दिखाई दे रहे व्यापक एआई-प्रेरित औद्योगिक उछाल का हिस्सा माना जा रहा है.

यहाँ तक कि पाकिस्तान का रुपया भी स्थिर है. पिछले छह महीने में पाकिस्तानी रुपया अमेरिकी डॉलर की तुलना में 1.31 फ़ीसदी मज़बूत हुआ है जबकि इस साल भारतीय रुपए में छह फ़ीसदी से ज़्यादा की गिरावट आई है. अभी एक डॉलर के लिए 278 पाकिस्तानी रुपए देने होते हैं. दुबई की न्यूज़ वेबसाइट खलीज टाइम्स से सेंचुरी फ़ाइनैंशियल के मुख्य निवेश अधिकारी विजय वलेचा के अनुसार, क्षेत्रीय तनावों के बावजूद हाल के महीनों में पाकिस्तानी रुपया स्थिर बना हुआ है. इसकी एक बड़ी वजह मार्च तिमाही में दर्ज करंट अकाउंट सरप्लस रहा, जिसने ऊंची तेल क़ीमतों और जियोपॉलिटिकल ख़तरों के दौर में विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम किया.

रुपए में गिरावट का असर क्या होता है?
कमज़ोर होती मुद्रा का सबसे सीधा असर आयात पर पड़ता है. जब रुपया गिरता है, तो तेल, रसोई गैस, उर्वरक और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी ज़रूरी वस्तुओं का आयात महंगा हो जाता है. भारत इनमें से ज़्यादातर चीज़ें विदेशों से ख़रीदता है.

कमज़ोर रुपया वैश्विक निवेशकों को नए बाज़ार देखने पर मजबूर करता है क्योंकि उनके रिटर्न पर असर पड़ता है.मई के अंत तक विदेशी निवेशकों ने रिकॉर्ड 23 अरब डॉलर के शेयर भारतीय बाज़ारों में बेच डाले.स्थानीय शेयर बाजार से विदेशी पूंजी के बाहर जाने से भारत के लिए चालू खाता घाटे को संतुलित रखना चुनौतीपूर्ण हो गया है.

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