नई दिल्ली। भारतीय राजनीति में एक ऐसा बदलाव दिखाई देने लगा है, जिसे आने वाले समय की बड़ी राजनीतिक तस्वीर का संकेत माना जा सकता है। सड़कों पर उतर रही युवा पीढ़ी अब सिर्फ सरकार और राजनीतिक दलों से सवाल नहीं कर रही, बल्कि मुख्यधारा के टेलीविजन मीडिया की भूमिका पर भी सीधे सवाल खड़े कर रही है।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर CJP आंदोलन की कवरेज के दौरान सामने आए दृश्य इसी बदलते माहौल की ओर इशारा करते हैं। 4 सितंबर की एक रिपोर्ट के मुताबिक, प्रदर्शन स्थल पर पहुंचे NDTV, News X, ABP News और Times Now जैसे चैनलों के पत्रकारों को प्रदर्शनकारियों के विरोध का सामना करना पड़ा। कई पत्रकारों के आसपास प्रदर्शनकारी जमा हो गए और ‘गोदी मीडिया हाय-हाय’ के नारे लगाए गए।
‘आप खबर दिखाते क्यों नहीं?’—युवाओं के सवालों ने बढ़ाई बेचैनी
प्रदर्शनकारियों की नाराजगी का केंद्र केवल किसी एक पत्रकार या चैनल का कवरेज नहीं था। सवाल यह था कि जिन मुद्दों को लेकर युवा सड़क पर हैं, क्या वही मुद्दे टीवी न्यूज के प्राइम टाइम में उतनी ही प्रमुखता से दिखाई देते हैं?
यही सवाल अब सोशल मीडिया पर भी तेजी से उठ रहा है। वायरल पोस्ट में कहा जा रहा है—
“गोदी मीडिया का फ्यूचर यही होने वाला है, क्योंकि इंडिया का Gen-Z जाग चुका है और जान भी चुका है।”
यह किसी सर्वे का निष्कर्ष नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर चल रहा एक राजनीतिक और व्यंग्यात्मक नैरेटिव है। लेकिन जंतर-मंतर के घटनाक्रम ने इस नैरेटिव को एक वास्तविक राजनीतिक संदर्भ जरूर दे दिया है।
टीवी स्टूडियो बनाम सड़क की राजनीति
एक समय था जब राजनीतिक विमर्श का बड़ा हिस्सा टीवी स्टूडियो की बहसों से तय होता था। लेकिन सोशल मीडिया के दौर में यह समीकरण तेजी से बदल रहा है।
आज प्रदर्शनकारी खुद वीडियो बना रहे हैं, लाइव अपडेट दे रहे हैं और अपनी बात सीधे जनता तक पहुंचा रहे हैं। ऐसे में टीवी पत्रकारों से भी सवाल होने लगे हैं कि वे जनता की आवाज रिकॉर्ड कर रहे हैं या स्टूडियो की तय बहस के लिए कंटेंट तलाश रहे हैं?
यही टकराव जंतर-मंतर पर दिखाई दिया।
पहले भी पत्रकार को बनाया गया था निशाना
यह पहली घटना नहीं है। जुलाई में CJP आंदोलन की कवरेज के दौरान Times Now के रिपोर्टर देव कोटक के साथ मारपीट की घटना सामने आई थी। Reuters ने भी इस घटना को रिपोर्ट करते हुए बताया था कि प्रदर्शनकारियों के बीच ‘गोदी मीडिया’ को लेकर गुस्सा था।
हालांकि, यहां एक महत्वपूर्ण बात भी सामने आती है। पत्रकारिता की आलोचना लोकतंत्र में पूरी तरह जायज है, लेकिन पत्रकार के साथ मारपीट या हिंसा को किसी भी राजनीतिक विचारधारा के नाम पर सही नहीं ठहराया जा सकता। Times Now की रिपोर्ट के अनुसार, CJP ने भी देव कोटक पर हुए हमले की निंदा की थी।
क्या बदल गया है Gen-Z का मीडिया व्यवहार?
दरअसल, असली राजनीतिक कहानी शायद यहीं से शुरू होती है।
नई पीढ़ी के पास अब खबरों के लिए सिर्फ टीवी चैनल नहीं हैं। YouTube, सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने सूचना के कई वैकल्पिक रास्ते खोल दिए हैं। युवा किसी घटना का टीवी संस्करण देखने के बाद उसी घटना के वीडियो, प्रत्यक्षदर्शियों की पोस्ट और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म की रिपोर्ट भी देख सकते हैं।
इससे मीडिया की विश्वसनीयता सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनती जा रही है।
अगर किसी चैनल की रिपोर्ट और जमीन पर मौजूद युवाओं के अनुभव में बड़ा अंतर दिखाई देता है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
‘गोदी मीडिया’ शब्द अब राजनीतिक हथियार बन चुका है
‘गोदी मीडिया’ शब्द पिछले कुछ वर्षों में सत्ता के करीब माने जाने वाले मीडिया संस्थानों की आलोचना के लिए विपक्ष और सरकार विरोधी समूहों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला प्रमुख राजनीतिक मुहावरा बन गया है।
अब यही शब्द युवा आंदोलनों में नारे के रूप में सुनाई दे रहा है।
इसका मतलब यह नहीं कि पूरा Gen-Z एक ही विचार रखता है। बल्कि यह युवा प्रदर्शनकारियों के एक हिस्से की मुख्यधारा टीवी मीडिया के प्रति नाराजगी को दर्शाता है। 4 सितंबर की रिपोर्ट में भी प्रदर्शनकारियों द्वारा टीवी पत्रकारों की कवरेज पर सवाल उठाने और उन्हें घेरने का उल्लेख है।
सत्ता के साथ-साथ मीडिया से भी सवाल—क्या यह नई राजनीति है?
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलू यही है कि युवा असंतोष अब केवल सरकार विरोध तक सीमित नहीं दिख रहा।
सरकार से सवाल—हां।
विपक्ष से सवाल—हां।
मीडिया से सवाल—अब वह भी हां।
यानी युवा आंदोलन राजनीतिक व्यवस्था के साथ-साथ उस व्यवस्था को जनता के सामने पेश करने वाले मीडिया से भी जवाब मांग रहा है।
और शायद यही वजह है कि जंतर-मंतर पर लगे ‘गोदी मीडिया हाय-हाय’ के नारे सिर्फ पत्रकारों के खिलाफ नारे नहीं रह जाते, बल्कि वे भारतीय मीडिया और उसकी विश्वसनीयता पर चल रही बड़ी बहस का हिस्सा बन जाते हैं।
असली सवाल: क्या टीवी मीडिया अपना दर्शक खो रहा है?
सोशल मीडिया पर यह दावा भले ही अतिशयोक्तिपूर्ण हो कि ‘गोदी मीडिया का फ्यूचर यही है’, लेकिन सवाल गंभीर है—क्या आने वाली पीढ़ी टीवी न्यूज को उसी तरह स्वीकार करेगी जैसे पिछली पीढ़ियां करती थीं?
अगर युवा अपने सवालों के जवाब टीवी स्क्रीन पर नहीं पाते और उन्हें वैकल्पिक डिजिटल माध्यमों पर तलाशने लगते हैं, तो मीडिया संस्थानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती दर्शक संख्या नहीं, भरोसा बचाए रखना होगी।
जंतर-मंतर की तस्वीरें इसी बदलते मीडिया दौर की एक राजनीतिक झलक हैं।
सवाल अब सिर्फ यह नहीं कि टीवी मीडिया क्या दिखाता है। सवाल यह भी है कि Gen-Z उसे कितना सच मानता है।