Home » दिल्ली में SIR पर बड़ा विवाद: 1.45 करोड़ में से 47 लाख नाम ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से बाहर, 33 लाख को नोटिस; सुप्रीम कोर्ट में उठे पारदर्शिता के सवाल

दिल्ली में SIR पर बड़ा विवाद: 1.45 करोड़ में से 47 लाख नाम ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से बाहर, 33 लाख को नोटिस; सुप्रीम कोर्ट में उठे पारदर्शिता के सवाल

by Admin
0 comments 22 views

नई दिल्ली: दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR (Special Intensive Revision) को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। 31 अगस्त को जारी ड्राफ्ट मतदाता सूची में करीब 47.7 लाख मतदाताओं के नाम शामिल नहीं किए गए, जबकि SIR से पहले दिल्ली की मतदाता सूची में करीब 1.45 करोड़ मतदाता दर्ज थे। यानी ड्राफ्ट सूची में लगभग हर तीन में से एक मतदाता का नाम नहीं दिखा। हालांकि, इसे अभी स्थायी रूप से मतदाता सूची से नाम हटाया जाना नहीं माना जा सकता, क्योंकि प्रभावित मतदाताओं के पास दावा दाखिल कर नाम शामिल कराने का अवसर है।

इसी के साथ SIR की प्रक्रिया में करीब 33.13 लाख ऐसे मतदाताओं को भी चिह्नित किया गया है, जिनके नाम ड्राफ्ट सूची में तो हैं, लेकिन उनके रिकॉर्ड में ‘No Mapping’ या ‘Logical Discrepancies’ जैसी विसंगतियां बताई गई हैं। इन्हीं नोटिसों और इनके आधार को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सवाल उठाए गए हैं।

47.7 लाख नाम ड्राफ्ट सूची से बाहर क्यों हुए?

दिल्ली में SIR के तहत चुनाव अधिकारियों और बूथ लेवल अधिकारियों ने घर-घर जाकर मतदाताओं के रिकॉर्ड का सत्यापन किया। इस प्रक्रिया में करीब 97.5 लाख मतदाताओं के Enumeration Forms प्राप्त और डिजिटाइज किए गए। बाकी मतदाताओं के फॉर्म प्राप्त नहीं हो सके या उन्हें संबंधित प्रक्रिया में शामिल नहीं किया जा सका।

इन मतदाताओं को Absent, Shifted, Dead, Duplicate और Others जैसी श्रेणियों में रखा गया और उनके नाम ड्राफ्ट मतदाता सूची में शामिल नहीं हुए।

यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ड्राफ्ट सूची से नाम बाहर होना अंतिम निर्णय नहीं है। चुनाव अधिकारियों के मुताबिक, जिन लोगों का नाम ड्राफ्ट सूची में नहीं है, वे निर्धारित प्रक्रिया के तहत दावा दाखिल कर सकते हैं।

30 सितंबर तक नाम जुड़वाने का मौका

ड्राफ्ट सूची में नाम नहीं मिलने वाले मतदाताओं के लिए 30 सितंबर 2026 तक दावा दाखिल करने की प्रक्रिया खुली है। इसके लिए Form 6 और आवश्यक दस्तावेजों के माध्यम से नाम शामिल करने का अनुरोध किया जा सकता है।

दावों और आपत्तियों की जांच के बाद प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। अधिकारियों के निर्धारित कार्यक्रम के मुताबिक नोटिसों और दावों के निपटारे की प्रक्रिया 29 अक्टूबर तक चलेगी और दिल्ली की अंतिम SIR मतदाता सूची 4 नवंबर 2026 को प्रकाशित की जानी है।

इसलिए फिलहाल यह कहना अधिक सटीक है कि 47.7 लाख नाम ड्राफ्ट सूची से बाहर हैं, न कि ये सभी नाम हमेशा के लिए मतदाता सूची से हटाए जा चुके हैं।

33 लाख मतदाताओं को क्यों भेजे गए नोटिस?

SIR विवाद का दूसरा बड़ा पहलू करीब 33.13 लाख मतदाताओं को भेजे गए नोटिस हैं।

आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक:

  • करीब 13.80 लाख मतदाता ‘No Mapping’ श्रेणी में हैं।
  • करीब 19.33 लाख मतदाताओं को ‘Logical Discrepancies’ के तहत चिह्नित किया गया है।
  • दोनों श्रेणियों को मिलाकर करीब 33.13 लाख मतदाताओं के रिकॉर्ड की जांच की जा रही है।

‘No Mapping’ का सामान्य अर्थ है कि मौजूदा मतदाता रिकॉर्ड को पिछली SIR यानी 2002 की मतदाता सूची के संबंधित रिकॉर्ड से जोड़ा नहीं जा सका।

वहीं ‘Logical Discrepancies’ के तहत मतदाता रिकॉर्ड में विभिन्न प्रकार की असंगतियों को चिन्हित किया गया है। अधिकारियों के अनुसार इनमें नाम की स्पेलिंग में अंतर, परिवार के सदस्यों की उम्र से जुड़ी असामान्य प्रविष्टियां और डेटाबेस में अन्य विसंगतियां शामिल हो सकती हैं।

सुप्रीम कोर्ट में क्या है विवाद?

SIR को लेकर दायर याचिका में मुख्य सवाल पारदर्शिता और नोटिस जारी करने के आधार से जुड़े हैं।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यदि किसी मतदाता को ‘Logical Discrepancy’ के आधार पर नोटिस दिया जा रहा है, तो उसे यह स्पष्ट रूप से पता होना चाहिए कि उसके रिकॉर्ड में कौन-सी विसंगति पाई गई है और उस वर्गीकरण का आधार क्या है।

याचिका में नोटिस पाने वाले मतदाताओं की सूची, प्रत्येक मामले में नोटिस का कारण और ‘Logical Discrepancy’ तय करने के मानदंड सार्वजनिक करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं ने यह भी सवाल उठाया है कि संबंधित डेटा और वर्गीकरण की प्रक्रिया मतदाताओं के लिए पर्याप्त रूप से स्पष्ट है या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को 22 सितंबर 2026 को अन्य लंबित SIR मामलों के साथ सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है।

आडवाणी से लेकर जयशंकर तक, कई बड़े नामों को नोटिस

SIR की प्रक्रिया में जब प्रमुख नेताओं, अधिकारियों और सार्वजनिक हस्तियों के नाम भी नोटिस सूची में सामने आए तो इस मुद्दे ने और ध्यान खींचा।

रिपोर्टों के अनुसार पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, विदेश मंत्री एस. जयशंकर, पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल समेत कई प्रमुख लोगों के रिकॉर्ड में भी सत्यापन संबंधी विसंगतियां चिन्हित की गई हैं।

विदेश मंत्री एस. जयशंकर और उनकी पत्नी को ‘unmapped with last SIR’ श्रेणी में रखा गया है। इसी तरह आडवाणी के परिवार के कुछ सदस्यों के रिकॉर्ड भी पिछली मतदाता सूची से मैप नहीं हो सके।

इसके अलावा कई वरिष्ठ नौकरशाहों और संवैधानिक संस्थाओं से जुड़े लोगों के नाम भी नोटिस सूची में सामने आए हैं।

लेकिन नोटिस का मतलब नाम कटना नहीं है

इस पूरे विवाद में यह अंतर समझना बेहद जरूरी है।

SIR नोटिस मिलने का अर्थ यह नहीं है कि संबंधित व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से स्वतः हटा दिया गया है।

दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने स्पष्ट किया है कि सिस्टम द्वारा जारी नोटिस का उद्देश्य रिकॉर्ड में मौजूद विसंगतियों को ठीक करना है। किसी मतदाता का नाम हटाने से पहले उसे जवाब देने और अपनी स्थिति स्पष्ट करने का अवसर दिया जाएगा।

यानी नोटिस मिलने के बाद संबंधित मतदाता अपने दस्तावेज और स्पष्टीकरण देकर रिकॉर्ड को सही करा सकता है।

रेखा गुप्ता का मामला भी सामने आया

दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता का नाम भी SIR के दौरान सत्यापन के लिए चिह्नित किया गया था। रिपोर्टों के मुताबिक उनका मामला उम्र से जुड़ी विसंगति का था। बूथ लेवल अधिकारी द्वारा भौतिक सत्यापन के बाद उनके दस्तावेज और मतदाता विवरण को सत्यापित कर दिया गया और उनका रिकॉर्ड अंतिम सूची में शामिल किए जाने की प्रक्रिया में है।

यह उदाहरण यह भी दिखाता है कि नोटिस की प्रक्रिया अंतिम निष्कर्ष नहीं होती, बल्कि उसके बाद सत्यापन और जवाब का चरण आता है।

चुनाव आयोग की प्रक्रिया बनाम याचिकाकर्ताओं के सवाल

SIR को लेकर दो प्रमुख दृष्टिकोण सामने हैं।

चुनाव आयोग और निर्वाचन अधिकारियों का कहना है कि व्यापक घर-घर सत्यापन का उद्देश्य मतदाता सूची को अपडेट करना तथा मृत, स्थानांतरित, डुप्लीकेट या अन्य गलत प्रविष्टियों की पहचान करना है। ड्राफ्ट सूची में नाम नहीं आने वाले मतदाताओं को दावा दाखिल करने का अवसर दिया गया है।

दूसरी ओर, याचिकाकर्ताओं का सवाल प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर है। उनका कहना है कि लाखों मतदाताओं को प्रभावित करने वाली ऐसी प्रक्रिया में यह स्पष्ट होना चाहिए कि किसी व्यक्ति को किस आधार पर नोटिस दिया गया और ‘Logical Discrepancy’ जैसी श्रेणियां किन स्पष्ट मानकों के आधार पर तय की गईं।

यही सवाल अब सुप्रीम कोर्ट के सामने है।

SIR विवाद में अब आगे क्या होगा?

दिल्ली की SIR प्रक्रिया में आने वाले सप्ताह बेहद महत्वपूर्ण हैं।

30 सितंबर 2026 तक ड्राफ्ट सूची में नाम नहीं होने वाले मतदाता अपना दावा दाखिल कर सकते हैं। इसके बाद दावों और नोटिसों की जांच तथा निपटारे की प्रक्रिया 29 अक्टूबर तक चलेगी।

इसके बाद 4 नवंबर 2026 को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की जानी है।

इस बीच सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई यह तय करने में महत्वपूर्ण हो सकती है कि नोटिस जारी करने के मानदंड और पूरी प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग को किस स्तर तक अतिरिक्त जानकारी सार्वजनिक करनी होगी।

सबसे बड़ा सवाल

दिल्ली SIR विवाद को केवल “47 लाख वोटरों के नाम कट गए” तक सीमित करना पूरी तस्वीर नहीं बताता। असल में यहां तीन अलग-अलग स्तर के सवाल हैं—47.7 लाख नाम ड्राफ्ट सूची में क्यों नहीं आए, 33.13 लाख मतदाताओं को किन आधारों पर नोटिस मिला और इन दोनों प्रक्रियाओं में प्रभावित मतदाताओं को अपना पक्ष रखने तथा रिकॉर्ड सुधारने की प्रक्रिया कितनी स्पष्ट और पारदर्शी है।

फिलहाल 47.7 लाख नामों को स्थायी रूप से हटाया जाना अंतिम स्थिति नहीं है। अंतिम तस्वीर दावों, आपत्तियों, सत्यापन और 4 नवंबर को प्रकाशित होने वाली अंतिम मतदाता सूची के बाद ही स्पष्ट होगी।

You may also like

Leave a Comment