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7.8% GDP पर मायावती का मोदी सरकार पर हमला- ‘जुगाड़ के आंकड़े हैं तो चिंता की बात’, पूछा- गरीब जनता को क्या मिला?

by Admin
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लखनऊ: देश की अर्थव्यवस्था की रफ्तार को लेकर केंद्र सरकार के 7.8 प्रतिशत GDP ग्रोथ के दावे के बीच बहुजन समाज पार्टी (BSP) प्रमुख मायावती ने मोदी सरकार पर तीखा राजनीतिक हमला बोला है। मायावती ने सवाल किया कि अगर देश की अर्थव्यवस्था इतनी तेजी से बढ़ रही है तो इसका असर देश की करोड़ों गरीब और मेहनतकश जनता की जिंदगी में क्यों दिखाई नहीं दे रहा?

शुक्रवार को X पर सिलसिलेवार पोस्ट में मायावती ने GDP के आंकड़ों से लेकर महंगाई, गरीबी और बेरोजगारी तक के मुद्दे उठाए। उन्होंने कहा कि यदि 7.8 प्रतिशत की विकास दर वास्तविक है तो यह निश्चित रूप से अच्छी बात है, लेकिन अगर ये केवल ‘जुगाड़ के आंकड़े’ हैं तो यह देश और जनता के लिए चिंता का विषय है।

‘सरकार बताए, 7.8% का गरीबों को क्या फायदा मिला?’

मायावती ने सीधे सरकार से सवाल करते हुए कहा कि जनता को केवल GDP के बढ़ते आंकड़े बताने से काम नहीं चलेगा। सरकार को विश्वसनीय तरीके से यह बताना चाहिए कि इतनी ऊंची विकास दर का लाभ देश की करोड़ों गरीब और मेहनतकश जनता को कितना मिला है और आगे कितना मिलने वाला है।

उनका कहना है कि एक तरफ सरकार तेज आर्थिक विकास के आंकड़े पेश कर रही है, वहीं दूसरी तरफ आम जनता महंगाई, गरीबी और बेरोजगारी जैसी समस्याओं का सामना कर रही है। ऐसे में जनता के सामने यह सवाल स्वाभाविक है कि आर्थिक विकास का वास्तविक लाभ आखिर किस वर्ग तक पहुंच रहा है।

‘विकास आंकड़ों में नहीं, जनता की जिंदगी में दिखना चाहिए’

मायावती ने विकास की सरकारी परिभाषा पर भी सवाल खड़ा किया। उन्होंने कहा कि GDP के आंकड़े अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन विकास की असली कसौटी जमीन पर आम आदमी की जिंदगी में होने वाला बदलाव है।

उनके मुताबिक ऐसा विकास ही वास्तविक और उपयोगी माना जाना चाहिए, जिससे समाज के कमजोर तबके को रोजगार मिले, गरीबी कम हो, लोगों की आय और जीवन-स्तर बेहतर हो तथा जनता को आत्म-सम्मान के साथ जीवन जीने का अवसर मिले।

यानी मायावती ने आर्थिक विकास की बहस को सिर्फ आंकड़ों से निकालकर रोजगार, महंगाई और गरीबों की आर्थिक स्थिति के मुद्दे से जोड़ दिया है।

‘धनवान सरकार की गरीब जनता’ पर सरकार को घेरा

BSP प्रमुख ने अपने बयान में सबसे तीखा राजनीतिक हमला उस समय किया, जब उन्होंने कहा कि अगर आर्थिक विकास का लाभ आम जनता तक नहीं पहुंचा तो देश के करीब 140 करोड़ लोगों को ‘धनवान सरकार की गरीब जनता’ होने का बोझ ढोना पड़ेगा।

मायावती ने कहा कि देश का विकास तभी ‘अच्छे दिन’ वाला कहा जा सकता है, जब करोड़ों बहुजन और मेहनतकश लोग गरीबी, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं से राहत पाकर आत्म-सम्मान के साथ कुछ सुखी जीवन जी सकें।

इस बयान के जरिए मायावती ने केंद्र की ‘विकसित भारत’ और आर्थिक विकास की राजनीति के सामने गरीब और मेहनतकश जनता की वास्तविक स्थिति को राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश की है।

यूपी के आउटसोर्स कर्मचारियों पर योगी सरकार को भी घेरा

मायावती ने केवल केंद्र के GDP आंकड़ों पर ही सवाल नहीं उठाया, बल्कि उत्तर प्रदेश सरकार की आउटसोर्स कर्मचारी व्यवस्था पर भी अपनी राय रखी।

उत्तर प्रदेश सरकार ने आउटसोर्स कर्मचारियों के लिए उत्तर प्रदेश आउटसोर्स सेवा निगम (UPCOS) की व्यवस्था शुरू की है। सरकार की ओर से इसके जरिए आउटसोर्स कर्मचारियों के मानदेय में बढ़ोतरी और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े लाभ देने की बात कही गई है।

मायावती ने हालांकि इसे पर्याप्त कदम नहीं माना। उन्होंने कहा कि कर्मचारियों का मानदेय बढ़ाने और सुरक्षा कवर देने से बेहतर होता कि सरकार उन्हें सीधे सरकारी नौकरी देती।

‘आउटसोर्सिंग खत्म कर स्थायी रोजगार दे सरकार’

मायावती का तर्क है कि नियमित सरकारी नौकरी से कर्मचारियों को ज्यादा स्थायी रोजगार सुरक्षा मिल सकती है और आउटसोर्स व्यवस्था में कथित तौर पर सामने आने वाली अफसरशाही, मनमानी, भ्रष्टाचार और शोषण जैसी समस्याओं से भी राहत मिल सकती है।

इस मुद्दे के जरिए BSP प्रमुख ने रोजगार की राजनीति को भी केंद्र में लाने की कोशिश की है। उनका सवाल मूल रूप से यह है कि अगर सरकार के पास इतने बड़े पैमाने पर कर्मचारियों की जरूरत है, तो उन्हें अस्थायी या आउटसोर्स व्यवस्था में रखने के बजाय स्थायी सरकारी रोजगार क्यों नहीं दिया जाना चाहिए?

मायावती का राजनीतिक संदेश साफ

मायावती के इस बयान का राजनीतिक संदेश साफ तौर पर आर्थिक विकास के सरकारी दावों और आम जनता की आर्थिक परेशानियों के बीच अंतर को उजागर करना है।

एक तरफ सरकार 7.8 प्रतिशत GDP ग्रोथ को अर्थव्यवस्था की मजबूती के संकेत के तौर पर पेश कर रही है, तो दूसरी तरफ मायावती पूछ रही हैं कि इस विकास का फायदा गरीब, बेरोजगार और मेहनतकश जनता की जेब और जिंदगी तक कितना पहुंचा।

GDP के आंकड़ों पर बहस अपनी जगह है, लेकिन मायावती ने इस बहस को सामाजिक न्याय और रोजगार के मुद्दे से जोड़ते हुए सरकार के सामने एक बड़ा राजनीतिक सवाल खड़ा किया है—अगर देश आगे बढ़ रहा है, तो देश की गरीब जनता की जिंदगी कितनी आगे बढ़ी?

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