Home » शिक्षा से रोजगार तक विरोधाभास: Gen Z के सवालों के बीच राहुल गांधी का संदेश, 19 सितंबर को इंदौर में ‘छात्रों की गूंज’

शिक्षा से रोजगार तक विरोधाभास: Gen Z के सवालों के बीच राहुल गांधी का संदेश, 19 सितंबर को इंदौर में ‘छात्रों की गूंज’

by Admin
0 comments 46 views

नई दिल्ली। शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं, सरकारी भर्तियों और रोजगार को लेकर युवाओं के बीच उठ रहे सवाल अब राजनीतिक बहस का भी हिस्सा बनते जा रहे हैं। इसी क्रम में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने छात्रों, युवाओं और भारत की Gen Z को संबोधित करते हुए शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं।

राहुल गांधी ने कहा, “मेरे प्यारे छात्रों, युवाओं और भारत के Gen Z, आपके साथ सारा देश देख रहा है कि आज एक टूटी हुई शिक्षा व्यवस्था ने आपकी उम्मीदों की लौ को बुझा कर आपके भविष्य को अंधेरे में धकेल दिया है।”

राहुल गांधी का यह बयान ऐसे समय आया है, जब देश में परीक्षा व्यवस्था, भर्ती प्रक्रिया और रोजगार के अवसरों को लेकर युवाओं की चिंताएं लगातार राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन रही हैं। हालांकि, शिक्षा और रोजगार को लेकर सरकार की ओर से कई योजनाओं और सुधारों को अपनी उपलब्धियों के तौर पर प्रस्तुत किया जाता रहा है। ऐसे में वास्तविक सवाल यह है कि इन नीतियों का असर युवाओं को जमीन पर कितना महसूस हो रहा है।

डिग्री के बाद नौकरी का सवाल

आज युवा केवल अच्छी शिक्षा नहीं चाहता, बल्कि शिक्षा के बाद एक स्पष्ट रोजगार का रास्ता भी चाहता है। कॉलेज की पढ़ाई के बाद प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी, परीक्षा की तारीख, परिणाम, भर्ती और नियुक्ति तक की लंबी प्रक्रिया कई युवाओं के लिए वर्षों की प्रतीक्षा में बदल जाती है।

यहीं शिक्षा और रोजगार के बीच का विरोधाभास सामने आता है।

एक तरफ युवाओं को स्किल, डिजिटल शिक्षा और नए अवसरों के लिए तैयार करने की बात होती है, दूसरी तरफ बड़ी संख्या में युवा स्थिर और सुरक्षित रोजगार के लिए सरकारी नौकरियों की ओर देखते हैं।

सवाल यह है कि क्या शिक्षा व्यवस्था युवाओं को केवल डिग्री और कौशल दे रही है, या उन्हें पर्याप्त रोजगार के अवसरों तक भी पहुंचा पा रही है?

सरकार के दावे और युवाओं के अनुभव

सरकार की ओर से शिक्षा सुधार, कौशल विकास, स्टार्टअप और रोजगार के नए क्षेत्रों को बढ़ावा देने पर जोर दिया जाता है। वहीं विपक्ष और सरकार की आलोचना करने वाले समूह परीक्षा में देरी, भर्ती प्रक्रिया, बेरोजगारी और रोजगार की गुणवत्ता जैसे मुद्दे उठाते रहे हैं।

इसलिए बहस को केवल “सरकार बनाम विपक्ष” के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा।

असल सवाल यह है कि नीति के स्तर पर किए गए दावों और छात्र-युवा के व्यक्तिगत अनुभव के बीच कितना अंतर है।

अगर किसी युवा को वर्षों की पढ़ाई और तैयारी के बाद भी परीक्षा और भर्ती के लिए लंबा इंतजार करना पड़े, तो उसके लिए शिक्षा की सफलता का पैमाना केवल डिग्री नहीं, बल्कि रोजगार का अवसर भी होगा।

Gen Z के सवाल अब राजनीतिक मुद्दा

Gen Z की खासियत यह है कि वह सरकारी नीतियों और राजनीतिक दावों को सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म और अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर परखती है।

परीक्षा, फीस, कोचिंग, भर्ती, नौकरी और भविष्य की सुरक्षा जैसे मुद्दे इस पीढ़ी के लिए सीधे जीवन से जुड़े सवाल हैं। यही कारण है कि छात्रों से जुड़े मुद्दे अब केवल कैंपस तक सीमित नहीं रह गए हैं।

राहुल गांधी ने इसी व्यापक चिंता को अपने संदेश में राजनीतिक स्वर दिया है। लेकिन युवाओं के सवाल किसी एक राजनीतिक दल या नेता तक सीमित नहीं हैं। सरकार से लेकर विपक्ष तक, युवाओं की अपेक्षा अब सिर्फ आश्वासन नहीं बल्कि ठोस परिणाम की है।

19 सितंबर को इंदौर में ‘छात्रों की गूंज’

धर्मेंद्र चौधरी कुशवाह की सोशल मीडिया पोस्ट में 19 सितंबर को इंदौर में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम का आह्वान किया गया है। पोस्ट के साथ राहुल गांधी का Gen Z के नाम संदेश भी साझा किया गया है।

ऐसे में इंदौर का प्रस्तावित कार्यक्रम छात्रों और युवाओं से जुड़े शिक्षा एवं रोजगार के मुद्दों को सामने रखने का मंच बन सकता है। कार्यक्रम में कितनी भागीदारी होती है और छात्रों की ओर से किन मुद्दों को प्रमुखता दी जाती है, यह आगे महत्वपूर्ण होगा।

राजनीतिक भाषण से आगे जवाबदेही की मांग

युवा राजनीति में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव शायद यही है कि अब छात्र केवल किसी नेता के भाषण से संतुष्ट नहीं होना चाहता।

वह जानना चाहता है—

परीक्षाएं समय पर होंगी या नहीं?
भर्तियां कब पूरी होंगी?
शिक्षा की बढ़ती लागत का बोझ कैसे कम होगा?
कौशल हासिल करने के बाद रोजगार के अवसर कितने होंगे?
और पढ़ाई पूरी करने के बाद भविष्य कितना सुरक्षित होगा?

राहुल गांधी का बयान इस बहस में विपक्ष की ओर से उठाई गई आवाज है। सरकार इन सवालों पर अपनी नीतियों और उपलब्धियों के आधार पर जवाब दे सकती है। लेकिन अंततः Gen Z के लिए सबसे महत्वपूर्ण पैमाना राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि शिक्षा से रोजगार तक मिलने वाला वास्तविक परिणाम होगा।

यही वह विरोधाभास है जिसने शिक्षा और रोजगार को आज सिर्फ नीतिगत मुद्दा नहीं, बल्कि युवाओं के भविष्य और सरकार की जवाबदेही का सवाल बना दिया है।

You may also like

Leave a Comment