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नारी मुक्ती की रचयिता :- राजकुमारी यशोधरा

by Admin
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संसार मे नारी के इतिहास का सही पन्ना पलट के देखे तो सबसे पहले राजकुमारी यशोधरा का चित्र सामने आ जाता हैं | क्युकी, उनके जीवन का संग्राम ही एक अनोखा था | नारी के जीवन के जो विविध पैलू हैं जैसे की, माता पिता की एक अच्छी बेटी होना, विवाह के बाद एक अच्छी बहू होना, एक धर्मनिष्ठ पतिव्रता, धर्मपत्नी बनना, एक कारुणिक संवेदनशील माता होना आदी सब नारी की भूमिकाओ के सभी पैलू हमे राजकुमारी यशोधरा के चरित्र मे दिखाई देते हैं | और इन सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण उन्होने जो अनोखा इतिहास रचा ओ हैं राजकुमार बोधिसत्व सिद्धार्थ के महाभिनिष्क्रण के बाद का ! उस समय उनकी उम्र सिर्फ 29 साल की थी | ओ एक तरुण थी, एक सुंदर नारी थी |अपने पती के गृहत्याग के बाद सुख की चाहत मे ओ चाहे तो कुछ भी कर सकती थी, जैसे की, दुसरा विवाह, या फिर अपने मायके भी चली जाती थी |क्युकी, ओ एक राजकुमारी थी | और राजकुमारी होने के नाते उनके पास पैसा, धन इन सबकी कोई कमी नहीं थी |

लेकिन, उन्होने ऐसा कुछ नहीं किया | पती के जाने के बाद उन्होने अपने पुत्र राहुल और सास ससुर, परिवार सबको संभालकर महल मे रहके भी अपने पती के कदमो के पिछे चलती रही, उनके मार्ग का अनुगमन करती रही | और ये सब उनके भितर का पतिप्रेम और एकनिष्ठता का प्रतीक था | क्युकी, माता रमाई को बाबासाहेब फिर से घर मे लौट आयेंगे ये कम से कम आस तो थी | लेकिन, राजकुमारी यशोधरा को पती दोबारा लौट आयेंगे इसकी कोई उम्मीद तक बची नहीं थी | फिर भी उन्होने सबको संभाला | कुछ लोगो को ऐसा लगता हैं की, पैसा, धन आदी ये सब होने से सबकुछ ठीकठाक होता हैं | पर ऐसा नहीं हैं |पैसा, धन ये सब इन्सान को सिर्फ जीवन व्यापन करने के लिये मददगार बन सकते हैं | लेकिन इससे जीवन का सही उद्देश कभी हासील नहीं होता | और अगर ऐसा होता तो राजकुमार बोधिसत्व सिद्ध्यर्थ के पास ये सबकुछ था |

लेकिन, फिर भी उन्होने गृहत्याग किया | उन्हे ये सब करने की क्या जरुरत थी? इसका अर्थ यही हैं की, पैसा, धन ये इन्सान की जिने की जरुरते पुरी करते हैं, लेकिन ईससे जीवन का का सही उद्देश हासील नहीं होता | इसलिये, वे रोकने से भी नहीं रुके | राजकुमारी यशोधरा ने भी वही किया |महल मे रहने के बावजुद भी उन्होने एक गृहत्यागयुक्त जीवन को अपनाके नारी के इतिहास को एक नया आदर्श, एक नया आयाम दिया की, जिनके कारण, आज इस संसार की हर नारी एक स्वतंत्रपूर्ण जीवन जीकर अपने मुक्ती का मार्ग भी स्वयं चुन सकती हैं |और निर्वाण तक हासील कर सकती हैं | सही मायने मे बुद्धासासन मे भिक्खुणी होने का सबसे पहला स्थान राजकुमारी यशोधरा को ही जाता हैं | लेकिन, बडो का आदर सत्कार, सम्मान करना चाहिए, इस पवित्रता के कायम रखने के खातीर महाप्रजापती गौतमी को भिक्खुणी संघ का उत्तरदायित्व दिया गया | चाहे कुछ भी हो मगर इस पुरे संसार मे मुक्ती के मार्ग पर चलनेवाली इन सास और बहू ने भी नारी के पुरे इतिहास को एक ऐसा बेमिसाल बना दिया की, जिनके आदर्श और एहेसान को इस संसार की कोई भी नारी कभी भुला नहीं सकती |

(नारी एक चिंतन :- पु. भिक्खुणी बुध्दकन्या, थेरी, कारंजा लाड, महाराष्ट्रा ) Courtesy : yashodhara is a painting by Manjit Singh 

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