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‘ब्रेस्ट पकड़ना रेप नहीं…’, इलाहाबाद HC के जस्टिस मिश्रा के उस फैसले पर भड़का सुप्रीम कोर्ट…

by Admin
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सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्रा के उस फैसले पर रोक लगा दी है, जिसमें मिश्रा ने कहा था कि नाबालिग लड़की के ब्रेस्ट पकड़ना और उसके पायजामे के नाड़े को तोड़ना रेप या अटेम्प्ट टु रेप नहीं है।

जस्टिस बीआर गवई और एजी मसीह की बेंच ने इस केस पर सुनवाई की। बेंच ने कहा, “हाईकोर्ट के ऑर्डर में की गई कुछ टिप्पणियां पूरी तरह असंवेदनशील और अमानवीय नजरिया दिखाती हैं।” सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र, उत्तर प्रदेश सरकार और अन्य पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले पर तत्काल रोक लगा दी है.

जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने कहा-

यह बहुत गंभीर मामला है और जिस जज ने यह फैसला दिया, उसकी तरफ से बहुत असंवेदनशीलता दिखाई गई। हमें यह कहते हुए बहुत दुख है कि फैसला लिखने वाले में संवेदनशीलता की पूरी तरह कमी थी।केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा- सुप्रीम कोर्ट का फैसला पूरी तरह से सही है। कुछ फैसलों को रोकने के कारण होते हैं।

राम मनोहर नारायण मिश्रा

राम मनोहर नारायण मिश्रा पर आपत्ति

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के उक्त आदेश पर आपत्ति जताई और कहा कि इस तरह की टिप्पणियां कानून के मूल सिद्धांतों से परे हैं और पूरी तरह से असंवेदनशील और अमानवीय दृष्टिकोण को दर्शाती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के इस आदेश पर स्वत: संज्ञान (Suo Motu) लेते हुए कड़ी असहमति जताई और इसे चौंकाने वाला करार दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि हमें यह कहने में दुख हो रहा है कि इस फैसले में, विशेष रूप से पैराग्राफ 21, 24 और 26 में, निर्णयकर्ता की पूर्ण असंवेदनशीलता झलकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यह निर्णय किसी जल्दबाजी में नहीं दिया गया था, बल्कि इसे चार महीने तक सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया। इसका अर्थ यह है कि न्यायाधीश ने इसे सोच-समझकर सुनाया। फिर भी, चूंकि इस फैसले की न्यायिक सिद्धांतों से कोई संगति नहीं थी और यह पूर्ण रूप से असंवेदनशील और अमानवीय दृष्टिकोण दर्शाता है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस फैसले की आलोचना करते हुए इसे चौंकाने वाला बताया। इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता द्वारा ‘We the Women of India’ नामक एनजीओ की ओर से भेजे गए पत्र के आधार पर संज्ञान लिया।

वी द वूमेन ऑफ इंडिया’ संगठन की भूमिका

गौरतलब है कि ‘वी द वूमेन ऑफ इंडिया’ संगठन उच्च न्यायालय द्वारा की गयी विवादास्पद टिप्पणियों को प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना के संज्ञान में लाया जिसके बाद शीर्ष न्यायालय ने इस मामले में स्वत: संज्ञान लिया। उच्च न्यायालय की विवादास्पद टिप्पणियों पर रोक लगाने का मतलब यह है किसी तरह की विधिक प्रक्रिया में इनका आगे इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा ने ये फैसला सुनाते हुए 2 आरोपियों पर लगी धाराएं बदल दीं। वहीं 3 आरोपियों के खिलाफ दायर क्रिमिनल रिवीजन पिटीशन स्वीकार कर ली थी।

3 साल पुराना मामला, मां ने दर्ज कराई थी FIR
दरअसल, यूपी के कासगंज की एक महिला ने 12 जनवरी, 2022 को कोर्ट में एक शिकायत दर्ज कराई थी। उसने आरोप था लगाया कि 10 नवंबर, 2021 को वह अपनी 14 साल की बेटी के साथ कासगंज के पटियाली में देवरानी के घर गई थी। उसी दिन शाम को अपने घर लौट रही थी। रास्ते में गांव के रहने वाले पवन, आकाश और अशोक मिल गए।

पवन ने बेटी को अपनी बाइक पर बैठाकर घर छोड़ने की बात कही। मां ने उस पर भरोसा करते हुए बाइक पर बैठा दिया, लेकिन रास्ते में पवन और आकाश ने लड़की के प्राइवेट पार्ट को पकड़ लिया। आकाश ने उसे पुलिया के नीचे खींचने का प्रयास करते हुए उसके पायजामे की डोरी तोड़ दी।

लड़की की चीख-पुकार सुनकर ट्रैक्टर से गुजर रहे सतीश और भूरे मौके पर पहुंचे। इस पर आरोपियों ने देसी तमंचा दिखाकर दोनों को धमकाया और फरार हो गए।

पीड़ित की मां FIR दर्ज कराने गई, लेकिन पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की
जब पीड़ित बच्ची की मां आरोपी पवन के घर शिकायत करने पहुंची, तो पवन के पिता अशोक ने उसके साथ गालीगलौज की और जान से मारने की धमकी दी। महिला अगले दिन थाने में FIR दर्ज कराने गई। जब पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की, तो उसने अदालत का रुख किया।

21 मार्च 2022 को कोर्ट ने आवेदन को शिकायत के रूप में मानकर मामले को आगे बढ़ाया। शिकायतकर्ता और गवाहों के बयान रिकॉर्ड किए गए। आरोपी पवन और आकाश के खिलाफ IPC की धारा 376, 354, 354B और POCSO एक्ट की धारा 18 के तहत केस दर्ज किया गया। वहीं आरोपी अशोक पर IPC की धारा 504 और 506 के तहत केस दर्ज किया।

आरोपियों ने समन आदेश से इनकार करते हुए हाईकोर्ट के सामने रिव्यू पिटीशन दायर की। यानी कोर्ट से कहा कि इन आरोपों पर दोबारा विचार कर लेना चाहिए। जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की सिंगल बेंच ने क्रिमिनल रिवीजन पिटीशन स्वीकार कर ली थी।

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