Home » सावित्रीबाई फुले : नारी मुक्ति आंदोलन की प्रणेता की १२९ वीं पुण्यतिथि पर विनम्र अभिवादन

सावित्रीबाई फुले : नारी मुक्ति आंदोलन की प्रणेता की १२९ वीं पुण्यतिथि पर विनम्र अभिवादन

by Admin
0 comments 26 views

भारत ने 10 मार्च 1897 को देश की पहली महिला शिक्षक सावित्रीबाई फुले को खो दिया था। एक समाज सुधारक, शिक्षाविद् और कवयित्री के रूप में फुले ने देश में कई अहम भूमिकाएं निभाईं। आज पूरा देश उनकी पुण्यतिथि मना रहा है और उनके द्वारा किए गए कार्यों के लिए उन्हें नमन कर रहा है। सावित्रीबाई फुले ने अपना पूरा जीवन महिलाओं के अधिकार के लिए संघर्ष करते हुए बिता दिया। देश की पहली महिला शिक्षक होने के नाते उन्होंने समाज के हर वर्ग की महिला को शिक्षा के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया। महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव में जन्मी सावित्री को आज भी महिलाओं के प्रेरणा के रूप में याद किया जाता है। आइए देश की पहली महिला शिक्षिका की पुण्यतिथि पर उनके जीवन से संबंधित कुछ जरूरी बातों को जान लेते हैं।

13 वर्ष में हो गई थी शादी लेकिन पति ने पूरा किया पढ़ने का ख्वाब
सावित्री बाई का जन्म 3 जनवरी 1831 में हुआ था। सामाजिक ताने-बाने के अनुसार सिर्फ 13 वर्ष की आयु में ही उनका विवाह हो गया। उनके पति का नाम ज्योतिराव फुले था। शादी के दौरान सावित्री पढ़ना-लिखना नहीं जानती थीं लेकिन पढ़ाई के प्रति उनकी रुचि और लगन को देखकर उनके पति बेहद प्रभावित हुए और उन्हें आगे पढ़ाने का मन बना लिया। हालांकि शादी के दौरान ज्योतिराव खुद एक छात्र थे लेकिन बावजूद इसके उन्होंने सावित्रीबाई को पढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसी का परिणाम रहा कि सावित्रीबाई ने शिक्षा प्राप्त कर टीचर की ट्रेनिंग ली और देश की पहली शिक्षिका बन गईं।

लोग बरसाते थे कीचड़ और पत्थर
जब पूरा भारत गुलामी की जिंदगी जी रहा था तब भी देश की महिलाओं को कई स्तरों पर भेदभाव और सामाजिक बुराइयों का सामना करना पड़ता था। खासतौर पर जब बात दलितों की आती तो भेदभाव का स्तर और बढ़ जाता था। सावित्रीबाई को भी दलित परिवार में जन्म लेने का खामियाजा भुगतना पड़ता था। जब वे स्कूल जाती तो लोग उनपर पत्थर बरसाते थे। केवल पुरुष ही नहीं बल्कि महिलाएं भी उनपर गोबर, कीचड़ आदि फेंकते थे। लेकिन इन सब अत्याचारों ने भी सावित्रीबाई का हौसला कम नहीं होने दिया और वे लगातार महिलाओं के हित के लिए कार्य करती रहीं।

1848 में महिलाओं के लिए पहला स्कूल खोला
फुले ने अपने पति के साथ मिलकर पुणे में लड़कियों के लिए स्कूल खोला। 1848 में खुले इस स्कूल को लड़कियों के खुला देश का पहला स्कूल माना जाता है। इतना ही नहीं बल्कि सावित्रीबाई और उनके पति ज्योतिराव फुले ने देश की महिलाओं के लिए 18 स्कूल खोले। इस कार्य के लिए उन्हें ब्रिटिश सरकार से सम्मानित भी किया गया था। इन स्कूलों की सबसे खास बात यह थी कि इसमें सभी वर्ग और जाति की महिलाएं शिक्षा प्राप्त करने आ सकती थीं। जहां उस समय महिलाओं को घर से बाहर जाने की इजाजत नहीं थी वहां सावित्रीबाई फुले का यह कदम बेहद सराहनीय था।

समाज सुधारक के साथ-साथ कवयित्री
केवल इतना ही नहीं बल्कि उन्होंने विधवाओं के लिए भी आश्रम खोला और परिवार से त्याग दी गई महिलाओं को भी शरण देने लगीं। सावित्रीबाई समाज सुधारक होने के साथ-साथ एक कवयित्री भी जिसने जाति और पितृसत्ता से संघर्ष करते हुए अपनी कविताएं लिखीं। उनका जीवन आज भी महिलाओं को संघर्ष करने और आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।महिलाओं को शिक्षा के प्रति जागरूक करने के लिए उन्होंने कहा …

जाऊया मुलांनो शिकावया,
धरुया शाळा घेऊनिया.
काबाड-कष्ट दूर करुनी,
विद्या मिळवूया.. ||१||
अज्ञानाचा अंधकार,
दूर सारूया सारे जण.
विज्ञानाची प्रकाशा,
पसरवूया घराघरातून.. ||२||
मनुस्मृतीची पाश तोडू,
समतेचे गीत गाऊया.
नवीन युगाची पहाट,
आपुल्या हाती आणूया.. ||३||”

सावित्रीबाई पहले के दो प्रमुख काव्य संग्रह हैं:काव्यफुले (1854): इसमें उनके शुरुआती विचार हैं।बावन्नकशी सुबोध रत्नाकर (1892): इसमें उन्होंने शिक्षा और सामाजिक समानता पर जोर दिया है। ये कविताएँ मुख्य रूप से शिक्षा के माध्यम से सामाजिक बदलाव का संदेश देती हैं।मात्र 23 साल की उम्र में सावित्रीबाई फुले का पहला काव्य संग्रह ‘काव्य फुले’ आ गया था, जिसमें उन्होंने धर्म, धर्मशास्त्र, धार्मिक पाखंड़ो और कुरीतियों के खिलाफ जमकर लिखा। औरतों की सामाजिक स्थिति पर कविताएं लिखीं और उनकी बुरी स्थिति के लिए जिम्मेदार धर्म, जाति, ब्राह्मणवाद और पितृसत्ता पर कड़ा पर प्रहार किया।

उन्होंने औरतों की सामाजिक स्थिति पर कविताएं लिखीं और उनकी बुरी स्थिति के लिए जिम्मेदार ब्राह्मणवाद और पितृसत्ता पर कड़ा पर प्रहार किया। सावित्रीबाई फुले अपनी एक कविता में दलितों औऱ बहुजनों को समाज में बैठी अज्ञानता को पहचान कर उसे पकड़कर कुचल-कुचल कर मारने के लिए कहती हैं, क्योंकि यह अज्ञानता यानी अशिक्षा ही दलित बहुजन और स्त्री समाज की दुश्मन है, जिसे जानबूझकर सोची-समझी साजिश के तहत वंचित समूह को ज्ञान से दूर रखा गया है।

हमारे जानी दुश्मन का नाम है अज्ञान
उसे धर दबोचो, मजबूत पकड़कर पीटो।

इस अशिक्षा रूपी अज्ञानता के कारण ही पूरा बहुजन समाज सवर्ण हिन्दुओं का गुलाम बना है। इनके पाखंड और कूटनीति के हथियार ज्योतिष, पंचाग, हस्तरेखा आदि पर व्यंग्य करती हुई सावित्रीबाई फुले कहती हैं–

ज्योतिष पंचाग हस्तरेखा में पड़े मूर्खों
स्वर्ग नरक की कल्पना में रूचि
पशु जीवन में ऐसे भ्रम की जगह न कोई
मूर्ख मकड़जाल से निकले न ही
हाथ पर हाथ धरे-बैठे मूर्खों निठल्लो को
कैसे इन्सान कहे?

सावित्रीबाई फुले जानती हैं कि शूद्र और दलितों की गरीबी का कारण क्या है। उनके मुताबिक, ब्राह्मणवाद केवल मन की एक मानसिकता ही नही वरन् एक पूरी व्यवस्था है, जिससे धर्म और ब्राह्मणवाद के पोषक तत्व देवी-देवता, रीति-रिवाज, पूजा-अर्चना आदि गरीब दलित दमित जनता को अपने में नियंत्रण में रखकर उनकी उन्नति के सारे रास्ते बंद कर उन्हें गरीबी, तंगी, बदहाली भरे जीवन में धकेलते आए हैं।

ताउम्र लोगों की सेवा करनेवाली ,भारत की पहली महिला शिक्षिका और समाज सुधारक सावित्रीबाई फुले का निधन 10 मार्च 1897 को पुणे में प्लेग (ब्यूबोनिक प्लेग) के कारण हुआ था। उन्होंने प्लेग महामारी के दौरान बीमार मरीजों की सेवा करते हुए अपनी जान गंवाई। वे 66 वर्ष की थीं जब एक संक्रमित बच्चे को बचाते हुए उन्हें भी प्लेग की चपेट में आना पड़ा।

You may also like

Leave a Comment